तन्त्र ओर कुण्डलिनी क्या है ?

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तंत्र क्या है ? ओर कुंडलिनी क्या होती है ? इसकी जाग्रत और सुप्त अवस्था, साधक कैसा होता है, और योगी कैसा होता है ? क्या इन दोनों में कोई भेद है ? क्या है दिव्या भूमि या देव भूमि ? और सिद्ध स्थिति कैसी होती है ? ऐसी कौन सी क्रिया हो सकती है जो उपरोक्त प्रश्नों को ना सिर्फ सुलझा दे बल्कि यथाचित वो उत्तर भी दे जो सर्व माननीय हो ?

किसी भी चीज़ को समझने के लिए कम से कम आज के युग में ये बहुत जरुरी हो गया है की कही गयी बात के पीछे कोई ठोस तर्क काम करता हो और यही स्थिति आज तंत्र के क्षेत्र में भी बनी हुई है…अपनी अपनी जगह पे हम सब जानते हैं की कोई भी साधना शुरू करने से पहले हमे इस बात को जानने की जल्दी होती है की इससे लाभ क्या होगा…तो मेरा अध्ययन मुझे बताता है की तंत्र ही जीवन है, ये कोई कोरी कल्पना नहीं बल्कि एक ठोस ज्ञान है. ज्ञान केवल तब तक ज्ञान रहता है जब तक की वो पूरी तरह से आपकी पकड़ में नहीं आ जाता पर जैसे ही आप उसके अंश विशेष को जानकर उसे अपने आधीन कर लेते हैं तो वही ज्ञान…विज्ञान बन जाता है, वो विज्ञान जिसमें आपका जीवन परिवर्तन करने की क्षमता होती है !

तंत्र भी एक ऐसा ही विज्ञान है पर हम इसमें विजयी हो सके उसके लिए जरूरी है कुंडलिनी जागरण. हम सब जानते हैं की हमारे शरीर में इड़ा (जो की चंद्र का प्रतीक है), पिंगला (जो सूर्य रूप में है) और सुष्मना (जो चन्द्र और सूर्य में समभाव स्थापित करती है) विधमान हैं जो क्रम अनुसार दक्षिण शक्ति, वाम शक्ति और मध्य शक्ति के रूप में हैं…और इन शक्तियों का त्रिकोण रूप में जो आधार बिंदु है वो शिव है पर ये बिंदु सिर्फ बोल देने से शिव रूप नहीं ले लेता इसके लिए तीनो त्रिकोनिये शक्तियों को जागृत होना पड़ता है अर्थात शिव तभी अपने चरम रूप में जाग्रत होते है जब तीनो शक्तियाँ जो की आदिशक्ति माँ काली, माँ तारा और माँ राजराजेश्वरी के रूप में हैं वो जागती हैं क्योकि शक्ति के बिना शिव अधूरे हैं !

माँ काली की जाग्रत अवस्था में शिव या बिंदु के शिवमय होने की प्रथम स्थिति है…पर इस वक्त शिव शव अर्थात क्रिया हीन रहते हैं…माँ तारा के जाग जाने से शिव अपने श्व्त्व में चरम रूप में होते हैं और राजराजेश्वरी माँ के जागने से शिव का श्व्त्व तो भंग हो जाता है पर वो निंद्रा में चले जाते हैं पर एक साधक के लिए ये पूरी प्रक्रिया कुंडलिनी जागरण ही होती है क्योकि इसमें भी नाभि कुंड में स्थापित कमलासन खुलता है पर राजराजेश्वरी माँ भगवती उसमें विराजमान नहीं होती वो विराजमान होती है गुरु कृपा से…और जब गुरु की कृपा दीक्षा या शक्तिपात से प्राप्त हो जाती है तो स्थिति बनती है आनंद की, विज्ञान की और फिर सत्य की…जिसे योगी अपनी भाषा में खंड, अखंड और महाखंड की अवस्थिति में वर्णित करते हैं….जहाँ हम में और हमारे इष्ट में कोई भेद नहीं होता है वो मैं और मैं वो बन जाते हैं यही मूल तन्त्र है !