ध्वनि प्रसारक यन्त्रों द्वारा व सामुहिक दीक्षा !

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सभी धर्म व सम्प्रदायों में गुरु का स्थान सर्वोच्च है ! लेकिन हमारे सनातन धर्म के धर्मगुरुओं, महागुरुओं और सिद्धगुरुओं का स्थान नीति, धर्म, शास्त्र, श्रृष्टि के नियम और ईश्वर से भी सर्वोच्च है, क्योंकि ये वो सब करने में सक्षम हैं जो कि नीति, धर्म, शास्त्र, श्रृष्टि के नियम और ईश्वर भी नहीं कर सकता है !

पिछले कुछ वर्षों से हमारे सनातन धर्म के धर्मगुरुओं, महागुरुओं और सिद्धगुरुओं की असीम कृपा व उनके द्वारा आधुनिक तकनीकियों के प्रयोग से हमारे सनातन धर्म की ख्याति और उसकी शिक्षा – दीक्षाएं दिन दस गुणा और रात सौ गुणा विस्तार कर रहे हैं ! हमारे सनातन धर्म के धर्मगुरु, महागुरु और सिद्धगुरु जन अपने धर्म व संस्कृति के संवर्धन के लिए दिन रात एक किये हुए हैं, इसके लिए ये हमारे परमपूजनीय महापुरुष गण सिद्धान्तीय व शास्त्रीय मर्यादाओं को भी भूलते जा रहे हैं !

ये बेचारे अपने धर्म व संस्कृति के संवर्धन व संरक्षण के लिए देश, काल, समय, शास्त्र और सिद्धान्त का विचार किये बिना कोई सामुहिक तो कोई ध्वनि प्रसारक यंत्रों के माध्यम से साधनाएं व मन्त्र दीक्षाएं बांटने में व्यस्त हैं ! इसमें भी सबसे विशेष बात यह है कि इस धर्म, आध्यात्म की शिक्षा – दीक्षा के बाजार में धर्म, आध्यात्म की शिक्षा – दीक्षा खरीदने के लिए केवल शास्त्र, सिद्धान्त से अनभिज्ञ या शास्त्र, सिद्धान्त के विपरीत आचरण करने वाले आधुनिक शिक्षा प्राप्त पढ़े लिखे मूर्ख व धनपति लोग ही योग्य होते हैं, शास्त्र, सिद्धान्त के अनुसार आचरण करने वाले और गरीब व मध्यम वर्ग के लोग इस बाजार में योग्य शिष्य भी नहीं बन पाते हैं !

और ये बेचारे अपने धर्म व संस्कृति के संवर्धन व संरक्षण के लिए इतना आत्मसमर्पित हो चुके हैं कि अब इन बेचारों को इतनी भी होश नहीं बची है कि दीक्षा देने के लिए सिद्धान्त व शास्त्रज्ञा क्या है ? और “सामुहिक सम्मलेन व ध्वनि प्रसारक यन्त्र आदि माध्यम” केवल जानकारियों, सूचनाओं के प्रचार प्रसार व दूर बैठे व्यक्ति तक अपनी बात पहुंचने के माध्यम मात्र होते हैं, यह सब दीक्षा की शक्ति व ऊर्जा संचारित या ग्रहण करने के माध्यम नहीं होते हैं ! व दीक्षा सदैव व्यक्तिगत ही होती है, यह कभी भी सार्वजनिक नहीं हो सकती है !

शास्त्राज्ञा व सिद्धान्त के अनुसार समूह में या ध्वनि प्रसारक यंत्रों के माध्यम से केवल ज्ञान व उपदेश दिया जा सकता है किन्तु न तो इस प्रकार से दीक्षा दी जा सकती है और न ही बीजमन्त्रों का उच्चारण किया या कराया जा सकता है ! शास्त्राज्ञा व सिद्धान्त के अनुसार दीक्षा केवल गुरु सानिध्य में ही प्राप्त हो सकती है, अथवा केवल अतिविषम परिस्थितियों में अत्यन्त संवेदनशील व घातक “प्राणप्रतिष्ठा” के सिद्धान्त के अनुसार ही दी जा सकती है ! इस प्रकार से दीक्षा देने के नाम पर शास्त्र व दीक्षा/साधना के नियम से अनभिज्ञ समाज को मूर्ख बनाकर भोगा अवश्य जा सकता है, जो कि वर्तमान में जहां तहां हो ही रहा है ! क्योंकि भजन, भोजन, गर्भाधान व दीक्षा सदैव व्यक्तिगत ही होते हैं, ये कभी भी सार्वजनिक नहीं हो सकते हैं !

शास्त्राज्ञा व सिद्धान्त के अनुसार केवल सामान्य ऋचाओं, सूक्तों, स्तोत्रों का उच्चारण किया जा सकता है, किन्तु बीजमन्त्रों का व दीक्षा में प्राप्त हुए मन्त्रों का अपने शिष्य को दिक्षादान के अतिरिक्त कभी भी मुख से उच्चारण नहीं किया जा सकता है !

शास्त्र कहता है कि अपने गुरु के अतिरिक्त अपनी साधना की विधि, अनुभव व मन्त्रों को कभी भी किसी के सम्मुख कहना या लिखना नहीं चाहिए, यदि आपने किसी मन्त्र को किसी अपात्र के सम्मुख या सभा (5 या इससे अधिक व्यक्ति) में उच्चारित कर दिया, और गुरु द्वारा प्रदत्त साधना विधि व मन्त्र की गोपनीयता को किसी भी प्रकार से भंग कर दिया तो निश्चित ही वह मन्त्र आपके अपने लिए कुछ समय या सदैव के लिए भी कीलित हो सकता है ! केवल यज्ञ के समय मन्त्रों का उच्चारण किया जा सकता है, किन्तु गुरु प्रदत्त मन्त्र का उच्चारण तब भी मानसिक ही किया जायेगा और स्वाहाकार को ही मुख से उच्चारण करके बोला जा सकता है !

यही कारण है कि अधिकतर साधक सतत साधना तो करते रहते हैं लेकिन उनको साधना का कोई परिणाम नहीं मिलता है, क्योंकि वह मनमुखी लोग साधना विधियों, मन्त्रों व नियमों को अपने अधीन मानकर या जानकारी के अभाव में उनका उल्लंघन, नियमों की अनदेखी, गोपनीयता का ह्रास और जहाँ-तहां मन्त्रों को लिखते या बोलते हुए पाए जाते हैं, फेसबुक जैसी सार्वजनिक जगह पर ऐसे स्वयंसिद्धपुरुष सर्वाधिक मात्रा में पाए जाते हैं, और ऐसे लोगों को कुछ समझाना चाहो तो ये उल्टा ज्ञान का पाठ पढ़ाने बैठ जाते हैं, क्योंकि पुस्तकें पढ़-पढ़कर इनका ज्ञान का भण्डार “ओवर फ्लो” जो हुआ रहता है !

बीजमन्त्र शक्तियों के बीज ही हैं और बीज के रूप में अन्तःकरण में ही पौषित होकर परिणाम प्रदान कर सकते हैं, जिस प्रकार बीज भूमि से बाहर ओर डिम्ब गर्भ से बाहर रहकर नष्ट हो जाता है ठीक उसी प्रकार ही बीजमन्त्रों का व दीक्षा में प्राप्त हुए मन्त्रों का केवल अन्तःकरण में ही जप किया जाता है ! वाह्य उच्चारण कर दिए जाने पर यह ऐसा करने वाले के लिए शक्ति व प्रभावहीन हो जाते हैं ! इसीलिए हमारे प्राचीन शास्त्रों में बीज मन्त्रों को कहीं भी नहीं लिखा गया है, प्राचीन शास्त्रों में केवल ऋचाओं व सूक्तों को ही लिखा गया है, उन्नीसवीं सदी अथवा बीसवीं सदी के प्रारम्भ का शास्त्र ग्रन्थ किसी के पास हो तो आप हमारी इस बात की पुष्टि उस ग्रन्थ का अध्ययन करके कर सकते हैं ! और दीक्षा के समय विद्वान् गुरु द्वारा ऋचाओं व सूक्तों में से बीजमंत्रों को उद्धृत कर अत्यन्त गोपनीयता से शिष्य को प्रदान किया जाता रहा है ! किन्तु बीसवीं सदी में धार्मिक व अन्य अनेक संक्रमण के परिणाम स्वरूप वर्तमान में उपलब्ध शास्त्रों में जहां तहां बीजमन्त्र ही बीजमन्त्र लिखे मिलते हैं, जो कि हमारी आध्यात्मिक संस्कृति के ह्रास का प्रमुख कारण है !

प्राचीन शास्त्रों में ऋचाओं व सूक्तों के रूप में मन्त्र इस प्रकार लिखे जाते हैं, और उनसे मन्त्र का सृजन इस प्रकार होता है :-
तारं ब्रह्ममुखे प्रोच्य शरयुग्मांतमीरितम !! इससे मन्त्र का उद्धरण इस प्रकार होगा :- ॐ ब्रह्ममुखे शर शर फट !

अगम निगम के ज्ञाता विज्ञानी ऋषिगण तो कह गए कि बीजमन्त्र तो बीज की रीती से ही उपजेगा और फल देगा, और आज के समय की अच्छा गा बजाकर, मजमा लगाकर अपना गुजारा करने वाली नौटंकियाँ ढिंढोरा पीट रही हैं कि “नाद ही ब्रह्म है” और हम अच्छा गा बजाकर अच्छा “ब्रह्मनाद” उत्पन्न करते हैं, अच्छी वीडियो सीडी, ऑडियो सीडी के द्वारा ब्रह्मज्ञान और दीक्षा देते हैं, बीज मन्त्रों और दीक्षा में प्राप्त मन्त्रों को खुला गा बजाकर जपो तो मोक्ष मिलेगा !

“स्वयंभूः दिव्य महागुरुओं, सिद्धगुरुओं” द्वारा नवसृजित इस “असैद्धान्तिक दिव्य विधि” से दीक्षा लेने वाले सज्जनों की वह दीक्षा पूर्ण नहीं होती है और ना ही उस साधना का कोई प्रतिफल ही साधक को प्राप्त होता है, इस विधि से दीक्षा लेने वाले सज्जनों द्वारा साधना किये जाने पर साधनाकाल अथवा साधना के उपरान्त यदि कुछ भी सकारात्मक घटना या किसी अभीष्ट समस्या का समाधान हो जाता है तो यह मात्र साधक की आस्था, श्रद्धा व सकारात्मकता के परिणाम स्वरूप अथवा मात्र एक संयोग अथवा उस समस्या का स्वतः ही निवृत्त होने का समय होने से होता है ! व इसके साथ ही वह साधक दोबारा भी वह दीक्षा लेने से सदैव के लिए प्रतिबन्धित हो जाते हैं, क्योंकि किसी भी मन्त्र की दीक्षा केवल एक बार ही हो सकती है, चाहे वह दीक्षा सैद्धान्तिक विधि से हो अथवा असैद्धान्तिक विधि से हो !

सामुहिक रूप से आमजनमानस को ध्वनि प्रसारक यंत्रों के माध्यम से मन्त्र दीक्षा प्रदान करना व दीक्षा में प्रदत्त गुह्य मन्त्रों का अपने शिष्यों द्वारा “अमर्यादित” स्वतन्त्र उच्चारण करवाना व दीक्षा में प्रदत्त गुह्य मन्त्रों का अमर्यादित स्वतन्त्र उच्चारण करने की स्वतंत्रता अपने शिष्यों को प्रदान कर दीक्षा विधान की मर्यादा का उल्लन्घन करना (जो कि शास्त्र सम्मत ही नहीं है, यह शास्त्रों में पुर्णतः निषेध है, ऐसा कराने वाला गुरु व ऐसा करने वाला शिष्य सर्वथा त्याज्य है)

इनको कहते हैं शास्त्राज्ञा का उल्लंघन करके शास्त्रों का ज्ञान देने वाले शास्त्रों के “पंजिकृत” ठेकेदार !!!

(किसी को इस लेख से आघात पहुंचा हो तो कृपया हमें क्षमा मत करना, बस आत्ममंथन करना कि आप भी ऐसा ही कोई सिद्धगुरु, महागुरु हैं या ऐसे ही किसी सिद्धगुरु, महागुरु के श्रीचरण सेवक हैं ???)