निःशुल्क एवं सशुल्क साधनाओं की व्यवस्था एवं परिभाषा !

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श्री ज्योतिर्मणि पीठ से संचालित होने वाली साधनाएं निःशुल्क एवं सशुल्क की दो श्रेणियों में विभक्त हैं ! वहीं सशुल्क साधना के विषय में साधकों को यह भ्रान्ति होती है कि उनसे साधना का शुल्क लिया जा रहा है, जबकि ऐसा कदापि नहीं है ! श्री ज्योतिर्मणि पीठ पर दीक्षा/साधना/अनुष्ठान की दक्षिणा के रूप में केवल एक (1) रुपया मात्र लिया जाता है, ओर वह एक (1) रुपया भी लेना अनिवार्य नहीं है वह साधक की इच्छा पर निर्भर है कि स्वेच्छा से दे या न दे !

श्री ज्योतिर्मणि पीठ पर पर्याप्त आवासीय व्यवस्था नहीं होने के कारण यहां पर आने वाले प्रत्येक साधक को अपने रहन-सहन की व्यवस्थाएं निकट की धर्मशालाओं में करनी होती है !


1 :- निःशुल्क साधनाओं को निम्नलिखित दो वर्गों में विभक्त किया गया है :-

1/क :- किसी साधना/अनुष्ठान की वह पद्धति जिसको यज्ञ विधान के बिना सम्पन्न किया जाना है ! इस पद्धति से साधना/अनुष्ठान सम्पन्न किए जाने पर वह साधना/अनुष्ठान दीर्घकालिक होती है अर्थात इस पद्धति से साधना/अनुष्ठान सम्पन्न किए जाने पर वह साधना/अनुष्ठान अधिक दिनों में सम्पन्न होती है ! तथा साधक को अपने रहन-सहन की व्यवस्था स्वयं के स्तर पर करनी होती है !

अतः इस पद्धति से साधना/अनुष्ठान को सम्पन्न करने हेतु यज्ञ सामग्री में किसी प्रकार का व्यय नहीं होने के कारण इसको निःशुल्क की श्रेणी में माना गया है !

1/ख :- वह साधनायें/अनुष्ठान जिनमें यज्ञ विधान को सम्पन्न किए जाने की आवश्यकता ही नहीं है ! इस पद्धति से साधना/अनुष्ठान सम्पन्न किए जाने पर वह साधना/अनुष्ठान दीर्घकालिक अथवा अल्पकालिक होगी यह उस साधना/अनुष्ठान पर निर्भर करता है ! कौन सी साधना/अनुष्ठान किस पद्धति से व कितने समय में सम्पन्न की जा सकती है यह हमारी वेबसाइट पर प्रत्येक साधना/अनुष्ठान के पृष्ठ पर स्पष्ट लिखा हुआ होता है ! तथा साधक को अपने रहन-सहन की व्यवस्था स्वयं के स्तर पर करनी होती है !

अतः इस पद्धति से साधना/अनुष्ठान को सम्पन्न करने हेतु साधक के रहन-सहन की व्यवस्था के अतिरिक्त यज्ञ सामग्री में किसी प्रकार का व्यय नहीं होने के कारण इसको निःशुल्क की श्रेणी में माना गया है !


2 :- सशुल्क साधना/अनुष्ठान को निम्नलिखित दो वर्गों में विभक्त किया गया है :-

2/क :- किसी साधना/अनुष्ठान की वह पद्धति जिसको यज्ञ विधान के द्वारा सम्पन्न किया जा सकता है ! इस पद्धति से साधना/अनुष्ठान सम्पन्न किए जाने पर वह साधना/अनुष्ठान अल्पकालिक होती है अर्थात इस पद्धति से साधना/अनुष्ठान सम्पन्न किए जाने पर वह साधना/अनुष्ठान कम दिनों में सम्पन्न होती है !

2/ख :- वह साधना/अनुष्ठान जिनको सम्पन्न करने के लिए यज्ञ विधान को सम्पन्न किया जाना ही अनिवार्य है ! तथा इस पद्धति से साधना/अनुष्ठान सम्पन्न किए जाने पर वह साधना/अनुष्ठान दीर्घकालिक अथवा अल्पकालिक होगी यह उस साधना/अनुष्ठान पर निर्भर करता है ! कौन सी साधना/अनुष्ठान किस पद्धति से व कितने समय में सम्पन्न की जा सकती है यह हमारी वेबसाइट पर प्रत्येक साधना/अनुष्ठान के पृष्ठ पर स्पष्ट लिखा हुआ होता है !

यज्ञ विधान द्वारा सम्पन्न होने या की जाने वाली दीक्षा/साधना/अनुष्ठान की सम्पूर्ण सामग्री हमारी वेबसाइट के दीक्षा व साधना हेतु आवश्यक सामग्रीविशेष अनुष्ठान हेतु आवश्यक सामग्री में स्पष्ट लिखी गई हैं, यहां देखकर प्रत्येक साधक अपने साधना/अनुष्ठान में प्रयुक्त होने वाली सामग्री को स्वयं क्रय कर लाने व अपने रहन-सहन की व्यवस्थाएं स्वयं के स्तर पर करने हेतु पूर्णतः स्वतन्त्र होता है !

किन्तु यदि साधक अपने साधना/अनुष्ठान में प्रयुक्त होने वाली सामग्री को किन्हीं कारणों से स्वयं के स्तर पर लाने में सक्षम नहीं होता है, तो उसके द्वारा दीक्षा/साधना/अनुष्ठान प्रारम्भ होने की तिथी से न्यूनतम सात दिवस पूर्व हमारी वेबसाइट के माध्यम से अपनी अभीष्ट दीक्षा/साधना/अनुष्ठान हेतु पंजिकरण करते हुए ऑनलाइन भुगतान किए जाने के उपरान्त प्रयुक्त होने वाली सामग्री व साधक के रहन-सहन की व्यवस्था हमारे द्वारा की जा सकती है !

अतः उपरोक्त 2/क व 2/ख में लिखे अनुसार पद्धति से दीक्षा/साधना/अनुष्ठान को सम्पन्न करने हेतु यज्ञ सामग्री व साधक के रहन-सहन की व्यवस्था में लगने वाले व्यय के कारण इसको सशुल्क की श्रेणी में माना गया है !


हमारी ओर से कहीं पर भी ऐसा आग्रह नहीं किया गया होता है कि कोई साधक हमें धन देकर ही किसी दीक्षा/साधना/अनुष्ठान में सम्मिलित हो सकता है, बल्कि प्रत्येक साधक से निःशुल्क विधान का चयन करने अथवा यज्ञ विधान द्वारा सम्पन्न होने या की जाने वाले दीक्षा/साधना/अनुष्ठान के पृष्ठ पर उसमें प्रयुक्त होने वाली सामग्री व अपने रहन-सहन आदि की व्यवस्थाएं स्वयं के स्तर पर करने का आग्रह ही साधकों से किया जाता है !

प्रत्येक जीव स्वयं के लिए कुछ प्राप्त करना चाहता है तो उसके बदले में उसे कुछ न कुछ तो निश्चित रूप से व्यय करना ही होता है, वह व्यय समय का भी हो सकता है ओर धन का भी हो सकता है ! यह निर्णय प्रत्येक जीव का अपना होता है कि उसको क्या व्यय करना है !