श्रीविद्या साधना के लिए अध्ययन करने योग्य अनिवार्य भेद !

समस्त साधनाओं के लिए निःशुल्क साधना पूर्व प्रशिक्षण शिविर के पंजिकरण को आम जनमानस के लिए खोल दिया गया है, अब आप निःशुल्क साधना पूर्व प्रशिक्षण हेतु पंजिकरण कर सकते हैं ! कोरोना संक्रमण से देश को राहत मिलते ही पंजिकृत साधकों को आमन्त्रित कर लिया जाएगा ! समस्त दीक्षा/साधना/अनुष्ठान एवं साधनापूर्व प्रशिक्षण की त्वरित जानकारियों हेतु हमारी मोबाईल ऐप इंस्टाल करें ! मोबाईल ऐप इंस्टाल करने हेतु क्लिक करें ! या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै नमो नमः । माँ भगवती आप सब के जीवन को अनन्त खुशियों से परिपूर्ण करें ।

(भारत के संविधान में प्रदत अभिव्यक्ति की आजादी के अधिकार के अंतर्गत इस पृष्ठ पर उपलब्ध लेख मेरे व्यक्तिगत विचार हैं व इनसे किसी जीवित या मृत प्राणीं या संस्था या वस्तु को जोड़कर न देखा जाए । यदि किसी कारणवश कहीं किसी प्राणी, संस्था या वस्तु से मिलती जुलती जानकारी आपको आभास होती हो तो वह आपका अपना चिंतन होगा जिसका समाधान आपको स्वयं करना होगा – मेरा कोई अभिप्राय नहीं है !)

श्रीविद्या साधना इस सृष्टि की सर्वोच्च साधना है, जो कि प्राणिमात्र को पिण्ड व ब्रह्माण्ड के मध्य के समस्त रहस्यों को एकतरफा सुलझाकर जीव को समस्त बन्धनों से विमुक्त कर देती है ! ओर इसी कारण आदि काल से ही यह साधना आध्यात्म मार्गी प्राणियों की प्रधान साधना रही है !

किन्तु वर्तमान में संक्रमित साहित्यों, अल्पज्ञानी या व्यवसायिक लेखकों, श्रीविद्या के अहंकारोन्मादित तथाकथित अथवा स्वयम्भू: साधक – गुरुओं की परम कृपा से यह मूल “श्रीविद्या साधना” अपना मूल स्वरूप खो चुकी है, ओर वर्तमान में श्रीविद्या साधना के नाम पर अनेक प्रकार की नई – नई साधनाएं विकसित कर ली गयी हैं , तथा अनेक अन्य साधनाओं को भी श्रीविद्या साधना का नाम दे कर प्रचारित व प्रसारित कर दिया जा रहा है, जो कि आध्यात्म मार्ग व श्रीविद्या साधना करने वाले प्राणियों के लिए किसी कुठाराघात व भ्रमजाल से कम नहीं है !

इस विषय में सभी सज्जन ज्ञानार्जन या साधनात्मक मार्गदर्शन आदि के लिए निर्द्वन्द भाव से ग्रंथों व पुस्तकों का सहारा लेते हैं, किन्तु यह कोई नहीं जान सकता है कि वह जिस ग्रन्थ या पुस्तक का अपने साधनात्मक ज्ञानवर्धन व मार्गदर्शन हेतु अध्ययन कर रहा है तो क्या वह पुस्तक स्वयं अनुभवी लेखक द्वारा लिखी गई है ? अथवा व्यवसायिक लेखक द्वारा केवल धनार्जन हेतु उपन्यास/साहित्य लिखा गया है ???

स्वयं सोचिए कि क्या इसका उत्तर भी आपको किसी लेखक की ही कलम से मिलेगा ???
कदापि नहीं मिलेगा, जब तक आपकी स्वयं की अंतरप्रज्ञा जागृत नहीं होगी तब तक यूँ ही छले जाते रहोगे, क्योंकि आपने स्वयं को अभी तक छले जाने योग्य ही तो बनाया है !

वर्तमान में श्रीविद्या की साधना तीन भेद से प्रचारित व प्रसारित हो रही है :-

1 :- प्रथम भेद को “श्रीविद्या पूर्णाभिषेक दीक्षा” कहा जाता है व इस पद्धति में ही मूल “श्रीविद्या दीक्षा” सम्पन्न होती है, श्रीविद्या क्रमशः धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष आदि चारों पुरुषार्थों का सन्धान करने वाली क्रमशः बाल्य, तरुण, प्रौढ़ व वृद्ध अवस्थाओं वाली चार महाविद्याओं का एक समूह होता है और इस सर्वावस्था सम्पन्न महाविद्या समूह को ही “श्रीविद्या” कहा जाता है, जिसका मन्त्र हादी, कादी, सादी ओर वादी परमविद्याओं में पृथक – पृथक किन्तु “षोडशाक्षरी विद्या” मन्त्र होता है, जो कि क्रमशः धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष आदि चारों पुरुषार्थों का सन्धान करता है, इस दीक्षा का मूल विधान भी केवल “श्रीविद्या पूर्णाभिषेक दीक्षा” प्राप्त सिद्ध साधकों के पास ही उपलब्ध होता है जो कि अत्यन्त गोपनीय होता है ! इस विषय में अधिक जानकारी हेतु यहां क्लिक करें !

2 :- दुसरे भेद को “श्रीविद्या क्रमदीक्षा” कहा जाता है व इस साधना में श्रीविद्या के कुल की महाविद्याओं में से कुछ एक, दो या तीन महाविद्याओं अर्थात “श्रीविद्या समूह की एक, दो या तीन देवियों” की दीक्षा प्रदान कर मत व अध्ययन के अनुसार “पंचदशाक्षरी विद्या या षोडशाक्षरी विद्या” मन्त्रों से साधना सम्पन्न कराई जाती है ओर इसे भी “श्रीविद्या क्रमदिक्षा” साधना के नाम से प्रचारित व प्रसारित किया जाता है, इस विधान से की गई साधना अन्तिम स्तर पर अत्यन्त संवेदनशील होने के कारण इस दीक्षा का मूल विधान केवल “श्रीविद्या पूर्णाभिषेक दीक्षा” प्राप्त सिद्ध साधकों, उच्च कोटि के तन्त्र साधकों व उच्च कोटि के किन्तु बहुत ही कम व दुर्लभ कर्मकाण्डी ब्राह्मणों के पास ही उपलब्ध होता है !
पिछले कुछ ही वर्षों में इस क्रमदिक्षा पद्धति के अंतर्गत ही दुर्भाग्यवश कुछ विद्वानों द्वारा श्रीविद्या की शक्ति के चिन्ह “श्रीयन्त्र या श्रीचक्र” की पूजा विधि द्वारा “श्रीविद्या की देवीयों की उपासना” पद्धति को भी श्रीविद्या साधना का नाम दे दिया गया है ! इस विषय में अधिक जानकारी हेतु यहां क्लिक करें !

3 :- तीसरा भेद (जो कि पुर्णतः विकृत व भ्रम युक्त है) को “महाविद्या दीक्षा या भोग साधना” कहा जाता है व इस साधना में श्रीविद्या के कुल की महाविद्याओं में से किसी एक या दो महाविद्या अर्थात “श्रीविद्या समूह की किसी एक या दो देवियों” की दीक्षा प्रदान कर मत व अध्ययन के अनुसार महाविद्याओं के “त्र्यक्षरी, पंचाक्षरी, द्वाद्शाक्षरी, पंचदशाक्षरी या षोडशाक्षरी विद्या” आदि मन्त्रों से साधना सम्पन्न कराई जाती है ओर इसे भी श्रीविद्या साधना के नाम से प्रचारित व प्रसारित किया जाता है, इस दीक्षा का मूल विधान “श्रीविद्या पूर्णाभिषेक दीक्षा” प्राप्त सिद्ध साधकों, उच्च कोटि के तांत्रिकों, अधिकतर कर्मकाण्डी ब्राह्मणों, साधकों व पुस्तकों आदि में कहीं भी सहजता से उपलब्ध हो जाता है ! इस विषय में अधिक जानकारी हेतु यहां क्लिक करें !

इसमें भी वास्तविक साधकों के लिए सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि जिन जिन राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय गुरुओं व संस्थानों द्वारा यह दीक्षाएं व साधनाएं वितरित की जा रही हैं वह सब दीक्षा व साधनाओं के सभी नियम सिद्धान्तों को ठिकाने लगाकर वितरित की जा रही हैं !

इसमें सबसे विशेष व संदिग्ध तथ्य यह हैं :-

शास्त्रीय सिद्धान्त के विरुद्ध समूह में दीक्षा देना, जिसमें सम्मोहन शक्ति का प्रयोग करके व्यक्ति के अवचेतन को आदेशित कर दीक्षित होने के भ्रम में डाल देना सम्भावित होता है ! विशेषकर आजकल जितने भी गुरु उपलब्ध हैं उनमें से 95% हीलिंग स्पेशलिस्ट ही हैं, और किसी भी हीलिंग स्पेशलिस्ट द्वारा समूह में या व्यक्तिगत भी दीक्षा देने के नाम पर अपनी ऊर्जा का सम्मोहन शक्ति के रूप में प्रयोग करके दीक्षा लेने वाले व्यक्ति के अवचेतन को आदेशित व सम्मोहित कर अपने नियन्त्रण में कर लेना ओर दीक्षित होने के भ्रम में डाल देना सबसे सरल कार्य हो सकता है !

फिर कुछ महीने या वर्ष के बाद जिस दिन शिष्य जी की सम्मोहन निद्रा टूटती है उस दिन सोचते हैं कि आज वो साधना में आनन्द और सिद्धियाँ कहां चली गईं ??? जो कभी आयी ही नहीं थी !!! फिर से नई यात्रा, नए गुरु की खोज प्रारम्भ !

पिछले 20-22 वर्षों से जिस प्रकार खुले पंडालों, पत्र-पत्रिकाओं, ऑडियो – वीडियो सीडी, मोबाईल, इन्टरनेट के माध्यमों से दीक्षा व साधना विधियों व प्रक्रियाओं की आंधियां चल रही हैं, और इन आंधियों में भारत की कुल व्यस्क जनसंख्या का 60% जनसमूह किसी न किसी रूप में उड़ता ही आ रहा है, यदि यह आंधियां शास्त्र सम्मत और सैद्धान्तिक हैं तो भारत वर्ष में धर्म, आध्यात्म, नीति, संस्कार, मान मर्यादाओं की जड़ें सुरक्षित और मजबूत क्यों नहीं हैं ? भारत वर्ष के वासी धर्म, आध्यात्म, नीति, संस्कार, शास्त्र, पुराणों से अनभिज्ञ विमुख व उदासीन क्यों हैं ? निश्चित ही इस सब के लिए किसी ना किसी रूप में हम सब ही उत्तरदायी हैं !

यदि इसी प्रकार पंडालों में प्रवचन सुनकर, अच्छे संगीत पर नाच गाकर या नियम सिद्धान्तों के विपरीत कर्म करते हुए सिद्धियाँ, शक्तियां और मोक्ष मिलते तो भारत की भूमि पर सन्यासियों के अतिरिक्त आम जनमानस में जितने सज्जन धर्म व साधनाओं में निरन्तर तत्पर आज भी विद्यमान हैं, ये सब अभी तक यहाँ कठिनाईयों से जूझते हुए नित्य नए नए गुरुओं की खोज में भटकते हुए ना होते और यह पृथ्वी मानव शून्य हो चुकी होती, ऊपर से देवताओं को इनके लिए 15-20 स्वर्ग अलग से बसाने पड़ जाते, यह अलग बात है कि अभी केवल 10-12 नरक ही बसाए जाने की योजना है !

और इन सब विषयों को मुर्ख से मुर्ख व्यक्ति भी आसानी से समझ सकता है लेकिन अपने धर्मशास्त्रों से विमुख अंग्रेजी व अधिक पढ़े लिखे मूर्खों को इन्हीं सब नौटंकियों में सिद्धियां और मोक्ष प्राप्त हो रहे हैं !

एक दिन हमारे शिष्य गौरव ने सहज ही हमसे पूछा कि गुरूजी समाज में कालनेमि (सन्त रूपी बहरूपिये) क्यों बैठे हैं ? इस पर सहज ही हमारे मुख से शब्द निकले कि बेटा अज्ञानियों के पास सन्त मार्गदर्शन करने, और हरी हरी कोमल सुन्दर दूब घास के पास गधा उसको चरने सहज ही पहुंच जाते हैं । तब सन्त तो अज्ञानियों को अपने ज्ञान द्वारा सद्मार्ग बताकर अपने मार्ग पर आगे बढ़ जाता है, ओर गधा उस हरी हरी कोमल सुन्दर दूब घास को खाकर हष्ट पुष्ट बन जाता है और फिर उस शेष बची कोमल दूब घास पर ही धमाचौकड़ी मचाकर अपने कठोर पैरों से कोमल दूब घास को ही रोंद डालता है । इसमें न सन्त का कोई दोष है और ना ही गधे का ही कोई दोष है, यह दोष उन अज्ञानियों और दूब घास का ही है ।

और ऐसा सब प्रपंच हो भी क्यों ना जब आम जनमानस को भी साधना, सिद्धि, धर्म, कर्म सब कुछ तो चाहिए, लेकिन बिना कुछ किये ही चाहिए, या फिर पैसे के बदले में किया कराया चाहिए, या कभी किसी विवशतावश स्वयं करना ही पड़े तो साधनात्मक विधान के नियमों में इस प्रकार छूट, समझौते मांगने बैठ जाते हैं जैसे कि साप्ताहिक सब्जी मंडी में रेहड़ी वाले के साथ एक रूपये के हरे धनिये के लिए मोल भाव कर रहे होंगे ! इससे अच्छा तो कुछ ना ही करो तो ही ठीक है, कम से कम शेष बची हुई संस्कृति तो विकृत होने से बची रह जाएगी !!

कुछ युगपुरुषों द्वारा तो सामान्य शारीरिक ऊर्जात्मक चिकित्सा विज्ञान की चिकित्सकीय पद्धतियों, नाद योग ओर दुर्गा सप्तशती को भी श्रीविद्या साधना के नाम के साथ जोड़कर प्रचारित करने से नहीं छोड़ा है, जैसे :- श्रीविद्या हीलिंग, श्रीविद्या प्राणिक हीलिंग, श्रीविद्या चक्रा हीलिंग, श्रीविद्या औरा हीलिंग, श्रीविद्या दुर्गा सप्तशती साधना, श्रीविद्या संजीवनी बीजमन्त्र साधना, श्रीविद्या नाद योग आदि चित्र विचित्र पद्धतियां ! इन युगपुरुषों के ये नखरे देखकर समझ में नहीं आता है कि “श्रीविद्या” एक अत्यन्त गहन व गुह्य सर्वोच्च साधना है या मात्र एक प्रोडक्ट ब्राण्ड नाम ही शेष बची है ? यदि ऐसा ही चलता रहा तो वह दिन भी दूर नहीं होगा जब यह पता लगाना असम्भव हो जायेगा कि श्रीविद्या वास्तव में है क्या ? और इस नाम की किसी साधना का अस्तित्व रहा भी होगा या नहीं ??

भ्रान्तिवश श्रीविद्या के अधीन “पूर्णाभिषेक दीक्षा”, “क्रमदीक्षा” व “महाविद्या दीक्षा” प्राप्त हुए तीनों प्रकार के उपासकों तथा पुस्तकों में सहज ही उपलब्ध “श्री यन्त्र” की पूजा विधि को सम्पन्न करने वाले “श्रीविद्या की देवीयों के उपासकों” को भी वर्तमान समाज के मध्य में श्रीविद्या उपासक ही कहा व माना जा रहा है, किन्तु अधिकार व उपलब्धियों में इनमें 64-8- व 1 का अनुपात होता है ! और केवल श्रीविद्या के अधीन “पूर्णाभिषेक दीक्षा” प्राप्त कर सैद्धान्तिक श्रीविद्या साधना करने वाले साधक मूल श्रीविद्या साधक होते हैं !

सम्प्रदायों में केवल “श्रीविद्या पूर्णाभिषेक दीक्षा” प्राप्त साधकों को ही श्रीविद्या उपासक की मान्यता होती है, और यही वास्तविक श्रीविद्या उपासक होते हैं ! “श्रीविद्या क्रमदीक्षा” व “महाविद्या दीक्षा या भोग साधना” प्राप्त साधकों को केवल “श्रीविद्या के अधीन महाविद्याओं” के उपासक के रूप में जाना जाता है, और यही पूर्ण सत्य भी है !

विवेकान्ध व तर्कशास्त्री गण ध्यान दें कि अर्थ के बिना काम कभी पूर्ण नहीं होता है, और धर्म के बिना मोक्ष काली कमली वाले के अन्नक्षेत्र के भण्डारे में नहीं बंटता है । इसीलिए मूल “श्रीविद्या साधना” ही सर्वोच्च है क्योंकि इसमें सबसे पहले धर्म पुरुषार्थ को ही साधना होता है, और धर्म युक्त अर्थ से काम के समस्त दैहिक, दैविक व भौतिक ऐश्वर्यों को भोगता हुआ निष्पाप प्राणी मोक्ष का अधिकारी तो स्वतः ही होता है ।

“श्रीविद्या पूर्णाभिषेक दीक्षा” के अतिरिक्त यदि इस संसार में श्रीविद्या साधना का कोई भी अन्य विधान पाया जाता है तो निश्चित ही वह इस मूल सर्वोपरि विद्या में अतिक्रमण है !

(यदि किसी को भी इस लेख से आघात पहुंचा हो तो कृपया हमें क्षमा मत करना, बस इस लेख का पुनः अध्ययन करना और आत्ममंथन करना कि हमारा सत्य सनातन धर्म ओर संस्कृति किस दिशा में जा रहे हैं और उसमें आपकी भूमिका क्या है ?)

(यह लेख श्री नीलकंठ गिरी जी महाराज द्वारा अपने साधनात्मक शोधों पर लिखित पुस्तक का एक अंश है जिसका सर्वाधिकार व मूल प्रति हमारे पास सुरक्षित है, अतः कोई भी संस्था, संस्थान, प्रकाशक, लेखक या व्यक्ति इस लेख का कोई भी अंश अपने नाम से छापने या प्रचारित करने से पूर्व इस लेख में छुपा लिए गए अनेक तथ्यों के लिए शास्त्रार्थ व संवैधानिक कार्यवाही के लिए तैयार रहना सुनिश्चित करें !)