श्रीविद्या पूर्णाभिषेक दीक्षा क्या है ?

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श्रीविद्या साधना इस सृष्टि की सर्वोच्च साधना है, जो कि प्राणिमात्र को पिण्ड व ब्रह्माण्ड के मध्य के समस्त रहस्यों को एकतरफा सुलझाकर जीव को समस्त बन्धनों से विमुक्त कर देती है ! ओर इसी कारण आदि काल से ही यह साधना आध्यात्म मार्गी प्राणियों की प्रधान साधना रही है !

इस परम सर्वोच्च श्रीविद्या साधना का प्रारम्भ “श्रीविद्या पूर्णाभिषेक दीक्षा” प्राप्त करने से होता है व इस पद्धति में ही मूल “श्रीविद्या दीक्षा” सम्पन्न होती है, श्रीविद्या क्रमशः धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष आदि चारों पुरुषार्थों का सन्धान करने वाली क्रमशः बाल्य, तरुण, प्रौढ़ व वृद्ध अवस्थाओं वाली चार महाविद्याओं का एक समूह होता है और इस सर्वावस्था सम्पन्न महाविद्या समूह को ही “श्रीविद्या” कहा जाता है, जिसका मन्त्र हादी, कादी, सादी ओर वादी परमविद्याओं में पृथक – पृथक किन्तु “षोडशाक्षरी विद्या” मन्त्र होता है, जो कि क्रमशः धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष आदि चारों पुरुषार्थों का सन्धान करता है, इस दीक्षा का मूल विधान भी केवल “श्रीविद्या पूर्णाभिषेक दीक्षा” प्राप्त सिद्ध साधकों के पास ही उपलब्ध होता है जो कि अत्यन्त गोपनीय होता है !

“श्रीविद्या पूर्णाभिषेक दीक्षा” में दीक्षित हुआ साधक विधिवत् श्रीविद्या दीक्षा लेकर गुरुआज्ञा से नियमानुसार साधना करता है, यह साधना मुख्यतः एक ही चरण में संपन्न होती है तथा साधना का प्रथम चरण विधिवत संपन्न होने के बाद प्रथम चरण की उपास्य शक्ति साधक को “धर्म” में स्थित कर स्वयं ही अग्रिम चरण “अर्थ व अग्रिम चरण की उपास्य शक्ति” की साधना की ओर अग्रसारित करती हैं ओर इसी प्रकार शेष अन्य दो चरणों के लिए भी साधक को उपास्य शक्तियों द्वारा ही अग्रसारित किया जाता है !

श्रीविद्या साधना का यह प्रथम चरण विधिवत संपन्न कराने के लिए गुरु अपने शिष्य को नियमित, संयमित रखकर अथवा श्रीविद्या की अन्य सहायक साधनायें संपन्न कराकर प्रथम चरण संपन्न कराता है ! प्रथम चरण विधिवत संपन्न होने के बाद केवल श्रीविद्या की कुल व क्रमानुसार उपास्य शक्ति भगवती पराम्बा साधक को स्वयं ही अर्थ, काम व मोक्ष की ओर अग्रसारित करती हैं ! प्रथम चरण विधिवत संपन्न हो जाने के बाद गुरु या शिष्य अपनी इच्छा से स्वयं कोई अग्रसारण या निर्णय नहीं ले सकते हैं ! एक बार “श्रीविद्या पूर्णाभिषेक दीक्षा” लेकर श्रीविद्या साधना सम्पन्न करने के लिए अन्य कोई दीक्षा लेने की आवश्यकता व उपयोगिता नहीं रह जाती है, साधना पूर्ण होने तक केवल गुरु का निर्देशन अवश्य आवश्यक होता है ! इसका साधक चारों पुरुषार्थों धर्म, अर्थ व काम से सर्वसंपन्न होकर समस्त भौतिक सुखों को भोगकर अंत में मोक्ष को प्राप्त करता है !

“पूर्णाभिषेक दीक्षा” प्राप्त साधक के पास चारों पुरुषार्थ धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष के विकल्प तथा साधना पूर्ण हो जाने पर अपने शिष्यों को “पूर्णाभिषेक दीक्षा” व “क्रमदीक्षा” दोनों ही देने के पूर्णाधिकार व शक्ति सदैव स्वतन्त्र होते हैं ! श्रीविद्या उपासना हेतु “श्रीविद्या पूर्णाभिषेक दीक्षा” लेना ही सर्वोत्तम होता है क्योंकि इसके साधक के पास अधिकार व शक्ति अनन्त होते हैं ! मनु, चन्द्र, कुबेर, लोपामुद्रा, मन्मथ, अगस्त्य, अग्नि, सूर्य, इन्द्र, स्कन्द, ह्यग्रीव, शिव, दुर्वासा, नन्दिकेश्वर, कामराज, कपिलमुनि, और आदिशंकराचार्य जी ने “श्रीविद्या पूर्णाभिषेक दीक्षा” से युक्त हो श्रीविद्या उपासना कर ही सर्वत्र विजयश्री को प्राप्त किया है, व इनकी परम्परा में श्रीविद्या दीक्षा प्राप्त करने वाले साधक “श्रीविद्या पूर्णाभिषेक दीक्षा”, “श्रीविद्या क्रमदीक्षा” व “महाविद्या दीक्षा या भोग साधना” तीनों में से कोई भी प्राप्त कर सकते हैं !

यह “श्रीविद्या पूर्णाभिषेक दीक्षा” ही मूल श्रीविद्या दीक्षा होती है जिसका मन्त्र केवल “षोडशाक्षरी” होता है, और इस “श्रीविद्या पूर्णाभिषेक दीक्षा” में दीक्षित होकर की गयी श्रीविद्या साधना ही मूल पूर्ण श्रीविद्या साधना होती है, तथा इस साधना के प्रभाव व परिणाम से ही धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष आदि चारों पुरुषार्थों की पुर्णतः प्राप्ति होती है !

“श्रीविद्या पूर्णाभिषेक दीक्षा” के अतिरिक्त यदि इस संसार में श्रीविद्या साधना का कोई भी अन्य विधान पाया जाता है तो निश्चित ही वह इस मूल सर्वोपरि विद्या में अतिक्रमण है !

(उपरोक्त समस्त प्रकरण में साधकों के हित के निमित्त श्रीविद्या साधना के मूल भेद को स्पष्ट लिख दिया गया है, लेकिन दुरूपयोग होने से रोकने के लिए कुल, पद्धति, सम्प्रदाय, पीठ व शक्तियों की मूल अवस्थिति को गोपनीय रख लिया गया है, जिसे मात्र श्रीविद्या में दीक्षित उपासक के समक्ष ही प्रकट किया जा सकता है !)

(यह लेख श्री नीलकंठ गिरी जी महाराज द्वारा अपने साधनात्मक शोधों पर लिखित पुस्तक का एक अंश है जिसका सर्वाधिकार व मूल प्रति हमारे पास सुरक्षित है, अतः कोई भी संस्था, संस्थान, प्रकाशक, लेखक या व्यक्ति इस लेख का कोई भी अंश अपने नाम से छापने या प्रचारित करने से पूर्व इस लेख में छुपा लिए गए अनेक तथ्यों के लिए शास्त्रार्थ व संवैधानिक कार्यवाही के लिए तैयार रहना सुनिश्चित करें !)