अप्सरा साधना व इसके लाभ क्या हैं ?

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मानव जीवन का सर्वोपरी लक्ष्य तो धर्माचरण करते हुए अपने दायित्वों का निर्वाह कर मोक्ष की प्राप्ति करना होता है , और इसके साथ ही मानव की एक मुख्य आवश्यकता होती है “आकर्षक व्यक्तित्व” , जिसके सहारे वह आत्मविभोर होकर जीवन की अनेक विषमताओं को सहज ही पार कर लेता है !

जो व्यक्ति अभिनय के क्षेत्र में सफल होने की इच्छा रखते हैं अथवा अपने जीवन में रूप, सौन्दर्य, यौवन, आकर्षक व्यक्तित्व, मन के अनुकूल जीवन साथी, कार्यक्षेत्र में मन के अनुकूल अधिकारी या सहकर्मी व जीवन में प्रेम सौहार्द आदि की हीनता के कारण मानसिक पीड़ा से व्यथित होते हैं , ऐसे व्यक्तियों के लिए अप्सरा साधना संपन्न कर लेना सर्वोत्तम मार्ग होता है !

सनातन धर्म के वैदिक व अगम शास्त्रों में प्राचीन काल से ही अप्सराओं की साधना का प्रचलन रहा है , क्योंकि इनकी साधना वैदिक देवी देवताओं की साधना से कहीं अधिक सहज व सरल होती हैं !

अप्सरा साधना संपन्न करने से अत्यंत कम समय में ही उत्तम अभिनय की कला, रूप, सौन्दर्य, यौवन, आकर्षक व्यक्तित्व, मन के अनुकूल जीवन साथी, कार्यक्षेत्र में मन के अनुकूल अधिकारी या सहकर्मी व जीवन में प्रेम सौहार्द, यौवन आदि के अपेक्षित परिणाम प्राप्त होकर साधक के भौतिक जीवन को सर्वानन्द से परिपूर्णता की प्राप्ति होती है ! यही कारण है कि अत्यंत कम समय में ही उत्तम आकर्षक व्यक्तित्व की सहजता प्रदान करने वाली अप्सराओं की साधना सामान्य गृहस्थ जन भौतिक जीवन की तृप्ति हेतु आदि काल से ही करते आये हैं !

एक विशेष विधि से तंत्रोक्त पद्धति से लिंगार्चन अथवा चक्रार्चन करने मात्र से भी अनेक अप्सराएं स्वतः ही सिद्ध हो जाती हैं ! किन्तु अप्सरा साधना आध्यात्मिक व आत्मोत्थान मार्ग का आधार कभी नहीं होती है !

अप्सरा साधना से होने वाले मुख्य लाभ :-
1 :- जो सज्जन पूर्ण रूप से हष्ट पुष्ट होते हुए भी आकर्षक व्यक्तित्व न होने के कारण अन्य लोगों को अपनी और आकर्षित नहीं कर पाते हैं तथा हीनभावना से ग्रस्त होते हैं , इस साधना के प्रभाव से उनका व्यक्तित्व अत्यंत आकर्षक व चुम्बकीय हो जाता है तथा उनके संपर्क में आने वाले सभी लोग उनकी और आकर्षित होने लगते हैं !
2 :- जो सज्जन मन के अनुकूल सुंदर जीवन साथी पाना चाहते हैं किन्तु किसी कारणवश यह संभव न हो रहा हो, इस साधना के प्रभाव से उनको मन के अनुकूल सुंदर जीवन साथी प्राप्त होने की स्थितियां उत्पन्न हो जाती हैं और मनचाहा जीवनसाथी मिल जाता है !
3 :- जिन सज्जनों के वैवाहिक, पारिवारिक, सामाजिक जीवन में क्लेश व तनाव की स्थिति उत्पन्न हो, इस साधना के प्रभाव से उनके वैवाहिक, पारिवारिक व सामाजिक जीवन में प्रेम सौहार्द की स्थितियां उत्पन्न हो जाती हैं !
4 :- जो सज्जन अभिनय के क्षेत्र में सफल होने की इच्छा रखते हैं किन्तु सफल नहीं हो पाते हैं, इस साधना के प्रभाव से उनके अंदर उत्तम अभिनय की क्षमता की वृद्धि होने के साथ-साथ अभिनय के क्षेत्र में सफल होने की स्थितियां उत्पन्न हो जाती हैं !
5 :- जो सज्जन युवावस्था में होने पर भी पूर्ण यौवन से युक्त नहीं होते हैं, इस साधना से उनके अंदर उत्तम यौवन व व्यक्तित्व निखर आता है !
6 :- जो सज्जन सुन्दर रूप सौन्दर्य की इच्छा रखते हैं किन्तु प्रकृति द्वारा कुरूपता से दण्डित हैं, इस साधना के प्रभाव से उनके अंदर आकर्षक रूप सौन्दर्य निखर आता है !
7 :- जो सज्जन कार्यक्षेत्र में मन के अनुकूल अधिकारी या सहकर्मी न होने के कारण असहज परिस्थियों में नौकरी करते हैं, या नौकरी चले जाने का भय रहता है, इस साधना के प्रभाव से उनके अधिकारी व सहकर्मी उनके साथ मित्रवत हो जाते हैं तथा नौकरी चले जाने का भय भी समाप्त हो जाता है!
8 :- जो सज्जन ऐसा मानते हैं कि वह अन्य लोगों को अपनी बात या कार्य से प्रभावित नहीं कर पाते हैं, इस साधना के प्रभाव से उनका व्यक्तित्व अत्यंत आकर्षक व चुम्बकीय हो जाता है तथा उनके संपर्क में आने वाले सभी लोग उनकी और आकर्षित होकर उनकी बातों या कार्य से प्रभावित होने लगते हैं !

उपरोक्त विषयों में अत्यंत कम समय में ही अपेक्षित परिणाम देकर आनंदमय जीवन को प्रशस्त करने वाली यह अप्सरा साधना अवश्य ही संपन्न कर लेनी चाहिए, जिससे निश्चित ही आप अपनी इच्छा की पूर्णता को प्राप्त कर सकते हैं व आनंदमय भौतिक जीवन व्यतीत कर सकते हैं ! क्योंकि अप्सराएं सौन्दर्य, यौवन, प्रेम, अभिनय, रस व रंग का ही प्रतिरूप होती हैं, अतः इनका प्रभाव जहाँ भी होता है वहां पर सौन्दर्य, यौवन, प्रेम, अभिनय, रस व रंग ही व्याप्त होता है !

अप्सराओं की साधना अनेक रूपों में की जाती है, जैसे माँ, बहन, पुत्री, पत्नी अथवा प्रेमिका के रूप में इनकी साधना की जाती है, ओर साधक जिस रूप में इनको साधता है ये उसी प्रकार का व्यवहार व परिणाम भी साधक को प्रदान करती हैं, अप्सराओं को पत्नी या प्रेमिका के रूप में साधने पर साधक को कोई कठिनाई या हानी नहीं होती है, क्योंकि यह तो साधक के व्यक्तित्व को इतना अधिक प्रभावशाली बना देती हैं कि साधक के संपर्क में रहने वाला प्रत्येक व्यक्ति अप्सरा साधक के मन के अनुकूल आचरण करने लगता है ! और अप्सरा को प्रत्यक्ष सिद्ध कर लिए जाने पर वह अपने गुण, धर्म, प्रभाव व सीमा के अधीन बिना किसी बाध्यता के अपनी सीमाओं के अधीन साधक की सभी इच्छाओं की पूर्ति करती है ! माँ के रूप में साधने पर वह ममतामय होकर साधक का सभी प्रकार से पुत्रवत पालन करती हैं तो बहन व पुत्री के रूप में साधने पर वह भावनामय होकर सहयोगात्मक होती हैं, ओर पत्नी या प्रेमिका के रूप में साधने पर उस साधक को उनसे अनेक सुख प्राप्त हो सकते हैं !

अप्सरा साधना :- यह साधना अत्यन्त ही सरल होती है जिसे कोई भी साधक गुरु से विधिवत दीक्षा लेकर आसानी से संपन्न कर सकता है, तथा इस साधना से साधक का व्यक्तित्व निखर कर उपरोक्त सभी लाभ प्राप्त होते हैं !

शुक्र के प्रभावकाल अर्थात 24 वर्ष तक की आयु के साधक की ऊर्जा प्रबल व उत्तम होने के कारण विधिवत दीक्षित होकर पुर्णतः गुरु के निर्देशन में रहकर सभी आवश्यक नियमों का पालन करते हुए मात्र 7 से 9 दिन में यह अप्सरा साधना पूर्ण कर अप्सरा सिद्धि प्राप्त कर सकता है, तथा इससे अधिक आयु के साधक को ऊर्जा के बल की न्यूनता के कारण साधना में तीन गुणा तक का समय अवश्य लग सकता है ! इस साधना को कोई भी संपन्न कर सकता है !

प्रत्यक्ष अप्सरा साधना :- यह प्रत्यक्षिकरण साधना थोड़ी कठिन होती है, इस साधना में साधनाकाल के समय डेढ़ से दो घंटे तक का स्थिर आसन, पूर्ण एकाग्रता, वीरभाव, ब्रह्मचर्य व निर्भयता की परम अनिवार्यता होती है, किन्तु श्रेष्ठ गुरु से विधिवत दीक्षा लेकर गुरु के निर्देशन में साधना करने से यह साधना भी अत्यन्त सरल बन जाती है ! तथा इस साधना से अप्सरा प्रत्यक्ष होकर अपनी सीमाओं के अधीन साधक के मन के अनुकूल कार्य करती है !

शुक्र के प्रभावकाल अर्थात 24 वर्ष तक की आयु के साधक की ऊर्जा प्रबल व उत्तम होने के कारण विधिवत दीक्षित होकर पुर्णतः गुरु के निर्देशन में रहकर सभी आवश्यक नियमों का पालन करते हुए मात्र 9 दिन में यह अप्सरा साधना पूर्ण कर अप्सरा सिद्धि प्राप्त कर अप्सरा को प्रत्यक्ष कर उससे अपने मन के अनुकूल नैतिक कार्य करा सकता है , तथा इससे अधिक आयु के साधक को ऊर्जा के बल की न्यूनता के कारण साधना में तीन गुणा तक का समय अवश्य लग सकता है ! यह साधना गुरु के निर्देशन और सानिध्य तथा साधक की योग्यता का निरीक्षण किये बिना नहीं करायी जा सकती है !