एक महत्वपूर्ण प्रश्न :- योग्य गुरु की खोज ?

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यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है कि योग्य गुरु की खोज कैसे करें ?

मेरे अनुसार सम्भवतः यह प्रश्न ही गलत हो सकता है, पहले ये तो पता चले कि आपको प्रकृति के सिद्धान्तानुसार आत्मकल्याण व आत्मोत्थान हेतु मार्गदर्शक “गुरु” चाहिए या नीतिविरुद्ध अपने अहं की अधिष्ठापना व भौतिक महत्वाकांक्षाओं, आवश्यकताओं व स्वार्थ की पूर्ति के लिए संरक्षक के रूप में “गुलाम” चाहिए ?

क्योंकि आजकल लोग “गुरु” को कम और एक ऐसे “नौकर” को अधिक खोजते हैं जो नीति, नियम व सिद्धान्तों की अनदेखी करके आपके मनोनुकूल रहकर आपकी भौतिक इच्छाओं और आवश्यकताओं को पूरा करने में आपकी सहायता व मार्गदर्शन कर सके, या आपके कार्यों जो संवैधानिक व सैद्धान्तिक हों या न हों बस उन्हें कैसे भी पूरा करके आपकी “गुलामी” कर सके, और आप समाज में उसको “गुरु” शब्द से सम्बोधित कर सकें !

जबकि गुरु का सबसे पहला कार्य ही “विध्वंस” है, गुरु जब तक शिष्य के भीतर के अहं ओर मनोविकारों का विध्वंस करके नवीन व विशुद्ध विकार रहित मानसिकता का सृजन प्रारम्भ न कर सके तब तक न कोई शिष्य है और न ही कोई गुरु है ! गुरु का कार्य शिष्य के मनोनुकूल कार्य न करके स्वतंत्रतापूर्वक निष्पक्ष निर्णय एवं निर्देश देकर शिष्य के उज्जवल भविष्य का निर्माण करना होता है, क्योंकि मनोनुकूल कार्य तो “भस्मासुर” की भांति आपके भविष्य को भी मिटा सकते हैं !

गुरु केवल वह होता है जो शिष्य के भीतर के अहं ओर मनोविकारों का विध्वंस करके शिष्य को अनैतिक व असैद्धान्तिक मार्गों से हटाकर केवल सिद्धान्त, न्याय व नीतियों द्वारा उसके आत्मिक, भौतिक व आध्यात्मिक उत्थान का मार्ग दिखा कर शिष्य के उज्जवल भविष्य का निर्माण कर सके ! और शिष्य केवल वह हो सकता है जो गुरु द्वारा किये जाने वाले इस विध्वंस में गुरु का पूर्ण सहयोग करके अपने लिए नवीन व विशुद्ध विकार रहित मानसिकता व उज्जवल भविष्य का सृजन प्रारम्भ कर सके ! क्योंकि आवश्यक परिवर्तन किये बिना तो आप अपने पुराने घर की रंगाई पुताई भी सही से नहीं कर सकते हैं, तो आपके स्वयं में परिवर्तन किये बिना जीवन में नवीनता व पूर्णता कैसे सम्भव हो सकती है ?

और आप खोजेंगे भी तो क्या ? आपमें स्वयं को पहचानने की क्षमता तो है नहीं, स्वयं को पहचानने के लिए तो दर दर की ठोकरें और धक्के खा रहे हो ! तो दुसरे को क्या खाक पहचान लोगे ? किसी दुसरे को पहचान लेने के नाम पर आप केवल अपने मानसिक प्रतिबिम्ब का अनुकूल व प्रतिकूल पक्ष ही तो पहचान सकते हो इससे अधिक और कुछ नहीं कर सकते हो ! “एक कुएं का मेंढक केवल दुसरे मेंढक को ही तो पहचान पायेगा” जबकि गुरु अथाह है, तो कैसे पहचानोगे अथाह को ? और जिसको आप पहचान गए, तो समझो कि आप और वह एक ही स्तर पर हैं, आपको उससे और कहीं अधिक गहरे की आवश्यकता है, और उससे और कहीं अधिक गहरे की खोज पर चल देना चाहिए !

लेकिन खोजने जाओगे कहां ??? कहीं पर कोई नहीं मिलेगा, पहले स्वयं में से स्वयं को ही ढूंढ़कर खोज लो ओर जांच लो ! तुम बहुत समझदार हो, कृत्य अकृत्य को भलीभांति जानते हो, अन्यों को उसका ज्ञान देते हो किन्तु स्वयं के आचरण में उसको सम्मिलित नहीं करते हो ! कृत्य अकृत्य के भेद को आत्म विश्लेषण करके स्वयं के आचरण में सम्मिलित करके स्वयं को संयम के पश्चाताप में ही तपा लो ! संयम में तपकर तुम स्वयं ही कुन्दन बन जाओगे तो जिसे तुम्हारी आवश्यकता होगी उल्टा वो स्वयं ही तुमको खोजेगा !

गुरु केवल निर्विकार व आस्थावान शिष्य के धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष सहित उसके सम्पूर्ण आत्मिक, भौतिक व आध्यात्मिक जीवन का उत्थान व उसके उज्जवल भविष्य का निर्माण कर सकता है, किन्तु पूर्वाग्रही, कुटिल व स्वार्थी व्यक्ति का कुछ नहीं हो सकता है, वह केवल इधर से उधर भटक ही सकता है ! समझदार व आत्मकल्याण चाहने वाले व्यक्ति को धर्म, नीति, न्याय, सिद्धान्त, नैतिकता, मानवता, संयम, संस्कृति व संस्कारों का आचरण करने वाले सज्जन को खोजकर उसके आदर्शों व शिक्षाओं का अनुसरण करना चाहिए, न कि नीति विरुद्ध सरल मार्ग की खोज !

अन्यथा इतना तो पक्का ही है कि तुम अपने आत्मोत्थान का नहीं, अपितु धर्म, नीति, न्याय, सिद्धान्त, नैतिकता, मानवता, संयम, संस्कृति व संस्कारों के विरुद्ध अपने अहं की अधिष्ठापना व भौतिक महत्वाकांक्षाओं के संरक्षक को ही खोज रहे हो, अर्थात तुम्हें कोई “गुरु” नहीं चाहिए, बल्कि तुम्हें केवल अपने अहं की अधिष्ठापना व भौतिक महत्वाकांक्षाओं का संरक्षक चाहिए जो कि निश्चित ही इसी विद्या में पारंगत भी होना चाहिए ! जब आपकी खोज ही न्याय, नीति विरुद्ध आचरण करने वाले व्यक्ति की है तो स्वयं ही सोचो कि तुम क्या खोज रहे हो ? और आप ऐसे गुरु के रूप में अपने महापतन का मार्ग ही तो खोज रहे हो न कि आध्यात्म, आत्मोत्थान व कल्याण का मार्ग !

साथ में यह भी स्मरण रखना चाहिए कि आध्यात्म व आत्मोत्थान के लिए सर्वप्रथम धर्म, नीति, न्याय, सिद्धान्त, मानवता, संयम व संस्कारों की आवश्यकता होती है “गुरु व साधनाओं” की नहीं ! यदि धर्म, नीति, न्याय, सिद्धान्त, नैतिकता, मानवता, संयम व संस्कारों को जीवन व व्यवहार में सम्मिलित करने की इच्छा न हो तो आप जहां हो और जैसे भी हो बहुत अच्छे और सुखी हो, क्योंकि इन सबके बिना एक पग भी आगे बढ़ने पर आप केवल स्वयं को ही कष्ट व क्षति पहुंचायेंगे इससे अधिक और कुछ नहीं कर पाएंगे !

प्रत्येक जीव अपने लिए योग्य गुरु को ढूंढ़ता है, इसके विपरीत स्वयं में शिष्य होने की योग्यता को खोजेंगे तो आपको आपके उद्देश्य में शीघ्र ही सफलता मिलेगी , गुरु रूपी तोपवान दीक्षा रूपी चिंगारी से केवल योग्य शिष्य रूपी उत्तम श्रेणी की बारूद को ही दहका कर विराट बना सकता है, जबकि अयोग्य व कुटिल शिष्य रूपी घटिया श्रेणी की बारूद का तो दहकती हुई भट्ठी में डाल देने पर भी कुछ नहीं हो सकेगा !

इसलिए जितना अथाह ज्ञान आप अन्य लोगों को बांटते हैं उसको स्वयं के आचरण में दृढ़तापूर्वक सम्मिलित करके अपनी योग्यता की वृद्धि करना चाहिए न कि गुरु की योग्यता का आंकलन, गुरु तो गुरु ही है आपके द्वारा आंकलन करने से आपको कुछ नहीं मिल सकता है ! आपकी योग्यता अवश्य उसे आप तक ले आएगी, अथवा आपको उस तक ले जाएगी ! जिस प्रकार गहराई की और जल स्वयं बहकर आ जाता है उसी प्रकार आपकी योग्यता व सुपात्रता की गहराई गुरु रूपी जल को स्वयं ही अपनी और खींच लेगी ! गुरु तो स्वयं प्रत्येक समय लुटने के लिए तैयार बैठे होते हैं, जिन्हें केवल शिष्य की योग्यता, विश्वास व समर्पण ही लूट सकता है, अन्यथा कोई नहीं !!! किन्तु समर्पण व विश्वासहीन, अहंकार व कुटिलता से परिपूर्ण जीव को शिष्य तो क्या शिष्य के जैसा हो जाना भी बहुत दूर की बात होती है !

अतः आप स्वयं के अन्दर योग्य शिष्य को खोज लें तो गुरु स्वयं ही मिल जायेगा, अथवा आप स्वयं ही योग्य शिष्य बनें तो गुरु स्वयं ही आपको खोज लेगा ! किन्तु जब तक आप मनोनुकूल कार्य करने में आपकी सहायता व मार्गदर्शन करने वाला “गुलाम” खोजेंगे तब तक तो “नहले को दहला” ही मिलेगा !!!

(यह लेख श्री नीलकण्ठ गिरी जी महाराज द्वारा अपने साधनात्मक शोधों पर लिखित पुस्तक का एक अंश है जिसका सर्वाधिकार व मूल प्रति हमारे पास सुरक्षित है, अतः कोई भी संस्था, संस्थान, प्रकाशक, लेखक या व्यक्ति इस लेख का कोई भी अंश अपने नाम से छापने या प्रचारित करने से पूर्व इस लेख में छुपा लिए गए अनेक तथ्यों के लिए शास्त्रार्थ व संवैधानिक कार्यवाही के लिए तैयार रहना सुनिश्चित करें !)