श्री शाम्भवी साधना व इसके लाभ क्या हैं ?

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शाम्भवी साधना श्रीविद्या “पूर्णदीक्षा” की अत्यंत महत्वपूर्ण सहायक साधना है ! शाम्भवी साधना अत्यंत तीक्ष्ण व अनन्त ऊर्जा का स्रोत्र है, जिसकी साधना साधक अपनी साधनात्मक ऊर्जा के अत्यंत तीक्ष्ण व तीव्रतम विस्तार हेतु करता है !

इस साधना के दो विधान हैं :-

पहला यौगिक विधान है जिसमें किसी प्रकार की दीक्षा नहीं लेनी होती है, केवल गुरु द्वारा निर्देशित विधि से नेत्रों को भृकुटी के केंद्र में स्थित कर सुषुम्ना में ऊर्जा का प्रवाह दिया जाता है, तथा इसमें सफल होने में एक-दो माह तक का समय अवश्य लग सकता है !

ओर दूसरा मन्त्र साधनात्मक विधान है जिसमें शाम्भवी मन्त्र दीक्षा का विधान संपन्न करने के उपरान्त गुरु द्वारा निर्देशित विधि से मन्त्र जप व यज्ञादि कर्म संपन्न करना होता है, तथा इसमें सफल होने में 5 से 7 दिन तक का समय अवश्य लग सकता है !

और यदि आज के परिवेश की गुरु निर्देशों की अवहेलना करने की आदत के अनुसार गुरु द्वारा निर्देशित विधि व नियमों में मनमानी व अवहेलना की तो यौगिक विधान से साधना करने वाले साधक को गुरु द्वारा निर्देशित विधि व नियमों की अवहेलना करके मनमानी रीति से साधना करने पर ऊर्जा अनियंत्रित हो जाने से किसी न किसी नेत्र व मस्तिष्क रोग का होना सुनिश्चित मानना चाहिए, और मन्त्र साधनात्मक विधान से साधना करने वाले साधक को गुरु द्वारा निर्देशित विधि व नियमों में मनमानी व अवहेलना करने पर गुरु द्वारा निर्देशित विधि व नियमों की अवहेलना करके मनमानी रीति से साधना करने पर ऊर्जा अनियंत्रित हो जाने से किसी न किसी मज्जा व पित्त रोग का होना सुनिश्चित मानना चाहिए ! क्योंकि शाम्भवी साधना कीर्तन मण्डली का गायन नृत्य नहीं है कि जैसे चाहो वैसे नाचो, यह तो अत्यंत तीक्ष्ण व अनन्त ऊर्जा का स्रोत्र है जिसके प्रवाह को केवल जीव के आनन्दमय कोष में स्थित व जाग्रत हुआ ब्रह्म अणु ही सहन कर सकता है जो कि केवल ब्रह्मविद्या व श्रीविद्या की विधिवत् षोडश संस्कारात्मक दीक्षा के उपरान्त ही जाग्रत होता है, इसकी साधना में गुरु द्वारा निर्देशित विधि व नियमों की अवहेलना करके मनमानी रीति से साधना करने से इसकी ऊर्जा जहाँ भी अनियंत्रित होगी वहीँ पर आघात करती है, अन्यथा विधिवत नियमानुसार साधना करने पर यह साधक की समस्त उर्जात्मक अवस्थाओं को आकण्ठ परिपूर्ण कर देती है !

कोई साधक जब साधना प्रारम्भ करता है तो नियमानुसार प्रत्येक साधना में पूर्ण नियंत्रित व निर्धारित ऊर्जा व ऊर्जा का वर्तुल परमावश्यक होता है जो साधना के परिणाम का मूल सूत्रधार होता है ! किसी भी साधना का परिणाम कहीं बाहर से आपको प्राप्त नहीं होता है, बल्कि वह केवल आपके अपने शरीर से उत्पन्न होने वाली दोष रहित ऊर्जा के साथ गुरु द्वारा बताई गई विशुद्ध ध्वनी व उच्चारण से मन में ऊच्चारित किये गए मन्त्र व यज्ञादि से उत्पन्न ऊर्जा का सामंजस्य स्थिर होकर पृथक-पृथक साधना के लिए पृथक-पृथक सुनिश्चित अनुपात में पिंड व ब्रह्माण्ड में वह ऊर्जा संग्रह हो जाने के उपरान्त ही उसका परिणाम प्राप्त होता है, न कि मन्त्र को रटने या असैद्धांतिक व मनमुखी रीतियों से साधना करने से !

श्रीविद्या “पूर्णदीक्षा” में दीक्षित हुआ साधक जब श्रीविद्या साधना प्रारम्भ करता है तो आयु की अधिकता, रोग, शारीरिक बल क्षीणता आदि किन्ही कारणों से साधक की ऊर्जा न्यून हो, और यदि साधक की ऊर्जा की न्यूनता के कारण साधनात्मक ऊर्जा ठीक से गति नहीं कर पा रही हो, तब केवल इस परिस्थिति में ही श्रीविद्या “पूर्णदीक्षा” में दीक्षित हुए साधक को यह शाम्भवी दीक्षा लेकर शाम्भवी साधना संपन्न करनी चाहिए ! और इस साधना को संपन्न करने के बाद श्रीविद्या “पूर्णदीक्षा” की साधना संपन्न करनी चाहिए !

आयु की अधिकता, रोग, शारीरिक बल क्षीणता आदि किन्ही कारणों से न्यून ऊर्जा वाला साधक श्रीविद्या “पूर्णदीक्षा” लेने के न्यूनतम एक सप्ताह के बाद ही यह दीक्षा लेकर पहले शाम्भवी साधना संपन्न कर तदुपरांत पुनः श्रीविद्या “पूर्णदीक्षा” की साधना पूर्ण कर सकता है, परन्तु श्रीविद्या पूर्णदीक्षा के समय अथवा श्रीविद्या पूर्णदीक्षा से पहले या श्रीविद्या पूर्णदीक्षा के बिना यह दीक्षा कदापि नहीं ले सकता है, यदि कोई साधक श्रीविद्या पूर्णदीक्षा के समय अथवा श्रीविद्या पूर्णदीक्षा से पहले या श्रीविद्या पूर्णदीक्षा के बिना यह दीक्षा ग्रहण करता है तो निश्चित ही उस साधक के विज्ञानमय कोष ओर आनन्दमय कोष में विकृति आ सकती है !

साधक अथवा उसको दीक्षा देने वाला गुरु ऊर्जा का पूर्वांकलन कर लेने के उपरान्त यदि दीक्षा विधान को संपन्न करता है, तो इससे साधक का बहुत अधिक समय व मानसिक तनाव को रोक कर कहीं अधिक शीघ्र श्रीविद्या “पूर्णदीक्षा” साधना में सफलता प्राप्त की जाती है !

यदि साधक की ऊर्जा का स्तर पुर्णतः उत्तम व नियंत्रित है तो साधक को शाम्भवी साधना कदापि नहीं करनी चाहिए, बल्कि अपने साधना विधान में ही गुरुगम्य होकर यथासम्भव सुधार करने चाहिए !