दिव्य पारिजात वृक्ष एवं उसका महत्व

समस्त दीक्षा/साधना/अनुष्ठान एवं साधनापूर्व प्रशिक्षण की त्वरित जानकारियों हेतु हमारी मोबाईल ऐप इंस्टाल करें ! मोबाईल ऐप इंस्टाल करने हेतु क्लिक करें ! या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै नमो नमः । माँ भगवती आप सब के जीवन को अनन्त खुशियों से परिपूर्ण करें ।

मान्यता के अनुसार परिजात वृक्ष की उत्पत्ति समुद्र से हुई थी न कि समुद्र मंथन से, जिसे देवराज इन्द्र ने अपनी वाटिका में रोप दिया था । समुद्र से उत्पन्न होने के कारण इसका नाम पारिजात रखा गया था । प्राचीन शास्त्रों में पांच वृक्षों को देववृक्ष कहा जाता है, “पंचैते देवतरवो मन्दार: पारिजातकः । सन्तान: कल्पवृक्षश्च पुंसिवा हरिचन्दनम ।।” अर्थात् मन्दार, पारिजात, सन्तान, कल्पवृक्ष व चन्दन यह पांच वृक्ष देववृक्ष कहे गए हैं । भ्रान्तिवश कुछ विद्वान् पारिजात वृक्ष को ही कल्पवृक्ष मानते हैं, किन्तु इस श्लोक से यह स्पष्ट हो जाता है कि कल्पवृक्ष ओर पारिजात वृक्ष दोनों एक दुसरे से भिन्न वृक्ष हैं । पारिजात के दिव्य वृक्ष को सनातन धर्मग्रन्थों, आयुर्वेद, आयुष, तन्त्र शास्त्रों में विशेष स्थान दिया गया है । जिसका वर्णन अनेक प्राचीन ग्रन्थों में मिलता है । पारिजात का वृक्ष औषधीय गुणों का अक्षय भण्डार है । इसमें बहुत ही सुंदर और सुगंधित पुष्प लगते हैं ।

श्रीकृष्ण जी द्वारा स्वर्ग से लाया गया पारिजात का वृक्ष ओर उसका विलय :-
पौराणिक मान्यता व हमारे व्यक्तिगत अनुसन्धान के अनुसार नरकासुर के वध के पश्चात एक बार श्रीकृष्ण स्वर्ग गए और वहां इन्द्र ने उन्हें पारिजात का पुष्प भेंट किया । वह पुष्प श्रीकृष्ण ने देवी रुक्मिणी को दे दिया । मान्यता के अनुसार देवी सत्यभामा ने भगवान श्री कृष्ण से जिद की कि पारिजात वृक्ष को स्वर्ग से लाकर उनकी वाटिका में रोपित किया जाए । श्री कृष्ण जी ने पारिजात वृक्ष लाने के लिए नारद मुनि को स्वर्ग लोक भेजा किन्तु देवराज इन्द्र ने उनके प्रस्ताव को ठुकरा दिया जिस पर श्री कृष्ण ने स्वर्ग में देवराज इन्द्र से युद्ध कर पारिजात को प्राप्त कर उसको देवी सत्यभामा की द्वारिका में स्थित वाटिका में लगा दिया था । किन्तु द्वारिका के सागर में समाहित हो जाने के साथ ही श्री कृष्ण जी द्वारा स्वर्ग से लाया गया पारिजात का वह वृक्ष भी सदैव के लिए सागर में समाहित हो गया था, जिसका कोई भी अंश – अवशेष इस भूमण्डल पर शेष नहीं है ।

देवराज इन्द्र द्वारा अर्जुन को प्राप्त पारिजात का वृक्ष ओर उसका विस्तार :-
पौराणिक मान्यता व हमारे व्यक्तिगत अनुसन्धान के अनुसार पाण्डवों की माता कुन्ती शिव भक्त थीं, तथा वह प्रतिदिन शिवोपासना करती थीं । एक बार जब पांडव पुत्र अर्जुन दिव्यास्त्रों तथा नृत्य एवं संगीत की शिक्षा हेतु इन्द्रलोक में गए थे तब देवराज इन्द्र ने अर्जुन को एक पारिजात का वृक्ष माता कुन्ती के लिए प्रदान किया था ताकि वह शिवोपासना में पारिजात के दिव्य पुष्पों का उपयोग कर अपने आराध्य को विशेष प्रसन्न कर सकें । देवराज इन्द्र से प्राप्त उस वृक्ष को अर्जुन ने जिस स्थान पर लगाया था उस स्थान का नाम अर्जुन की माता कुन्ती के नाम से किन्तूर पड़ा । यह किन्तूर गांव उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जनपद में है तथा अर्जुन के द्वारा स्थापित वह पारिजात का वृक्ष आज भी किन्तूर गांव में शोभायमान है ।

कालान्तर में अर्जुन के पौत्र जन्मेजय ने किन्तूर गांव में स्थित पारिजात वृक्ष से संवर्धन कर एक पारिजात वृक्ष को अन्यत्र स्थापित किया जो कि बाराबंकी जनपद के ही बोरोलिया गांव में शोभायमान है ।

पारिजात के दुर्लभ व प्राचीन दो वृक्ष आज भी उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जनपद के अंतर्गत किन्तूर एवं बोरोलिया गांव में शोभायमान हैं । लगभग 50 फीट गोलाई वाले तने व 45 फीट उँचाई के इन वृक्षों की आभा ही इनकी प्राचीनता, ऐतिहासिकता व पौराणिकता को प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त है । तथा उत्तर प्रदेश में अति दुर्लभ प्रजाति के पारिजात के चार वृक्षों में से हजारों वर्ष पुराने दो वृक्ष वन विभाग इटावा के परिसर में शोभायमान हैं ।

प्रत्येक वर्ष में सिर्फ़ एक बार बैशाख – ज्येष्ठ माह में सफ़ेद व मध्य से केसरिया रंग के सुन्दर सुगन्धित पुष्पों से सुसज्जित होता है । इस वृक्ष के पुष्प रात्रि में ही खिलते हैं व प्रातः होने पर मुरझा कर झड़ जाते हैं । किन्तु हमारे द्वारा 23 अगस्त 2018 को श्री ज्योतिर्मणि पीठ पर विशेष अनुष्ठान एवं देव शक्तियों के आह्वानपूर्वक श्रीयन्त्र एवं श्रीकुल उपासना में पारिजात पुष्पों के प्रयोगार्थ स्थापित किया गया पारिजात का विशेष वृक्ष वर्ष के बारहों माह पुष्प देने में सक्षम है तथा इसके पुष्प दिन में भी खिले रहते हैं जो कि दो से तीन दिन तक वृक्ष पर ही खिले रह जाते हैं । जबकि श्री ज्योतिर्मणि पीठ के निकट स्थित अन्य पारिजात वृक्ष भी आषाढ़ से कार्तिक माह तक पुष्पित रहते हैं ।

मान्यता है कि जब श्री कृष्ण इस दिव्य वृक्ष को स्वर्ग से पृथ्वी पर लाए थे तब देवराज इन्द्र ने इस वृक्ष को यह श्राप दे दिया था कि इस वृक्ष के फूल दिन में नहीं खिलेंगे व इसपर फल भी नहीं आएंगे । इसलिए इस वृक्ष के पुष्प रात्रि में ही खिलते हैं व इस वृक्ष पर फल नहीं आते हैं ।

गुण :- यह हलका, रूखा, तिक्त, कटु, गर्म, वात-कफनाशक, ज्वार नाशक, मृदु विरेचक, शामक, उष्णीय और रक्तशोधक होता है । सायटिका रोग को दूर करने का इसमें विशेष गुण है ।

रासायनिक संघटन :- इसके फूलों में सुगंधित तेल होता है। रंगीन पुष्प नलिका में निक्टैन्थीन नामक रंग द्रव्य ग्लूकोसाइड के रूप में 0.1% होता है जो केसर में स्थित ए-क्रोसेटिन के सदृश्य होता है। बीज मज्जा से 12-16% पीले भूरे रंग का स्थिर तेल निकलता है। पत्तों में टैनिक एसिड, मेथिलसेलिसिलेट, एक ग्लाइकोसाइड (1%), मैनिटाल (1.3%), एक राल (1.2%), कुछ उड़नशील तेल, विटामिन सी और ए पाया जाता है। छाल में एक ग्लाइकोसाइड और दो क्षाराभ होते हैं।

वानस्पतिक परिचय :- पारिजात के वृक्ष की उम्र की बात की जाए तो वैज्ञानिकों के अनुसार यह वृक्ष एक हजार से दस हजार वर्ष तक जीवित रह सकता है । इस प्रकार के वृक्षों की दुनिया में पारिजात, बरगद, पिलखन आदि मात्र पांच ही प्रजातियां हैं, जिन्हें एडोसोनिया वर्ग में रखा जाता है । पारिजात के वृक्ष को वनस्पति शास्त्री एडोसोनिया वर्ग का मानते हैं, जिसकी दुनिया भर में सिर्फ़ पाँच ही प्रजातियाँ पाई जाती हैं । इनमें से “डिजाहाट व डिजिटेटा” प्रजाति प्रमुख है । पारिजात वृक्ष डिजाहाट प्रजाति का है । पारिजात का वानस्पतिक नाम निक्टैन्थिस् आर्बोर-ट्रिस्टिस् है और यह ओलिएसी कुल से माना जाता है । जबकि पारिजात के वृक्ष का गुण-धर्म (DNA) भूमण्डल अर्थात् इस पृथ्वी का नहीं है, जिस कारण इस वृक्ष को पारलौकिक या स्वर्ग से लाया हुआ माना जाता है ।

संरक्षित वृक्ष :- उत्तर प्रदेश सरकार ने पारिजात के वृक्ष को संरक्षित घोषित किया हुआ है ।

डाक टिकिट :- केन्द्र सरकार ने पारिजात वृक्ष पर डाक टिकट भी जारी किया है ताकि अर्न्तराष्ट्रीय स्तर पर इसकी पहचान बन सके ।

हरसिंगार या हरिश्रृंगार का पुष्प भगवान हरि के श्रृंगार एवं पूजन में प्रयोग किया जाता है, इसलिए इस मनमोहक व सुगंधित पुष्प को हरसिंगार या हरिश्रृंगार के नाम से जाना जाता है ।
हरिवंश-पुराण के अनुसार, यह दिव्य वृक्ष इच्छापूरक भी है।

अन्य भाषाओं एवं राज्यों में पारिजात के नाम इस प्रकार से हैं :-
हिन्दी में :- पारिजात, प्राजक्ता, हरश्रृंगार, हरसिंगार, हरिश्रृंगार, कूरी, सिहारु, सेओली, गोरखचिंच ।
संस्कृत में :- पारिजात, पुष्पक, प्राजक्ता, प्राजक्त, रागपुष्पी, खरपत्रक ।
उत्तराखण्ड में :- पारिजात, कुरी (Kuri), हरसिंगार (Harsingar)।
उड़ीसा में :- गोडोकोडीको (Godokodiko), गंगा सेयोली (Ganga seyoli)।
उर्दू में :- गुलेजाफारी (Gulejafari), हरसिंगार (Harsingar)।
असम में :- सेवाली (Sewali)।
कोंकण में :- पारिजातक (Parizatak), पारडिक (Pardic)।
कन्नड़ में :- गोली (Goli), पारिजात (Parijata)।
गुजरात में : -हारशणगार (Harshangar), जयापार्वती (Jayaparvati)।
तमिलनाडु में :- मंझाटपू (Manjatpu), पवलमल्लिकै (Pavalmallikae)।
तेलंगाना में :- सेपाली (Sepali), पगडमल्ले (Pagadamallae), कपिलानागदुस्तु (Kapilanagadustu)।
बंगाली में :- हरसिंघार (Harsinghar), सेफालिका (Sephalika), शेउली (Seuli)।
नेपाल में :- पारिजात (Parijat)।
पंजाब में :- हरसिंघार (Harsinghar), कूरी (Kuri), पकुरा (Pakura)।
महाराष्ट्र में :- पारिजातक (Parijatak), खुरस्ली (Khursali)।
मलयालम में :- पविलामल्लि (Pavilamalli), परिजातकम (Parijatakam)।
अंग्रेजी- ट्री ऑफ सैडनेस (Tree of sadness), मस्क फ्लॉवर (Musk flower), कोरल जैसमिन (Coral jasmine), नाईट जैसमिन (Night jasmine)।

पारिजात के पुष्पों को खासतौर पर लक्ष्मी पूजन के लिए इस्तेमाल किया जाता है लेकिन केवल उन्हीं पुष्पों को इस्तेमाल किया जाता है, जो अपने आप पेड़ से टूटकर नीचे गिर जाते हैं । धन की देवी लक्ष्मी को पारिजात के पुष्प प्रिय हैं । उन्हें प्रसन्न करने में भी पारिजात वृक्ष का उपयोग किया जाता है । कहा जाता है के, होली, दीवाली, ग्रहण, रवि पुष्प तथा गुरु पुष्प नक्षत्र में पारिजात की पूजा की जाए तो उत्तम फल प्राप्त होता है ।

यह माना जाता है कि पारिजात के वृक्ष को छूने मात्र से ही व्यक्ति की थकान मिट जाती है ।