श्रीविद्या क्रमदीक्षा क्या है ?

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इस सृष्टि की सर्वोच्च साधना “श्रीविद्या साधना” वर्तमान समय में संक्रमित साहित्यों, अल्पज्ञानी या व्यवसायिक लेखकों, श्रीविद्या के अहंकारोन्मादित तथाकथित अथवा स्वयम्भू: साधक – गुरुओं की परम कृपा से यह मूल “श्रीविद्या साधना” अपना मूल स्वरूप खोती जा रही है और इस सर्वोच्च साधना के नाम पर अनेक प्रकार की नई – नई साधनाएं विकसित कर ली जा रही हैं , तथा अनेक अन्य साधनाओं को भी श्रीविद्या साधना का नाम दे कर प्रचारित व प्रसारित कर दिया जा रहा है, जो कि आध्यात्म मार्ग व श्रीविद्या साधना करने वाले प्राणियों के लिए अंधकारमय भविष्य का कारण बन सकती है !

वर्तमान समय में श्रीविद्या दीक्षा की एक पद्धति बहुप्रचलित हो रही है जिसे “श्रीविद्या क्रमदीक्षा” कहा जाता है व इस साधना में श्रीविद्या के कुल की महाविद्याओं में से कुछ एक, दो या तीन महाविद्याओं अर्थात “श्रीविद्या समूह की एक, दो या तीन देवियों” की दीक्षा प्रदान कर मत व अध्ययन के अनुसार “पंचदशाक्षरी विद्या या षोडशाक्षरी विद्या” मन्त्रों से साधना सम्पन्न कराई जाती है ओर इसे भी “श्रीविद्या क्रमदिक्षा” साधना के नाम से प्रचारित व प्रसारित किया जाता है, इस दीक्षा का मूल विधान केवल “श्रीविद्या पूर्णाभिषेक दीक्षा” प्राप्त सिद्ध साधकों व उच्च कोटि के तन्त्र साधकों के पास ही उपलब्ध होता है, इस विधान से की गई साधना अन्तिम स्तर पर अत्यन्त संवेदनशील होने के कारण कोई भी विवेकवान विद्वान गुरु अपने शिष्यों को इस पद्धति से साधना करने के लिए दीक्षा व इस पद्धति से साधना करने की स्वतन्त्रता नहीं प्रदान करता है ! किन्तु फिर भी स्वघोषित गुरुओं द्वारा किसी अभिप्रायवश इस पद्धति को ही अपनी “नैया खेवनहार” बनाकर रख दिया गया है !

श्रीविद्या की उपासना के इस भेद “श्रीविद्या क्रमदीक्षा” जो कि प्रारम्भ से श्रीविद्या दीक्षा नहीं होती है केवल महाविद्या दीक्षा ही होती है जिसे गुरु द्वारा भविष्य में “श्रीविद्या दीक्षा” में परिवर्तित किया जाता है, और गुरु द्वारा भविष्य में “श्रीविद्या दीक्षा” में परिवर्तित किया जाना भी सुनिश्चित नहीं होता है, क्योंकि अधिकतर साधकों के सम्मुख या तो ऐसा समय ही नहीं आ पाता है, और यदि ऐसा समय आ भी गया तो उस समय तक गुरु चेला दोनों उत्तर दक्षिण बन गए तो यह कैसे सम्भव हो पाएगा ???

यदि कोई साधक अहैतुक ही एक ही कुल की पृथक पृथक महाविद्याओं (बाल्या, तरुणा व प्रौढ़ा तक) की साधना सफलतापूर्वक सम्पन्न करते हुए क्रमशः धर्म, अर्थ व काम पुरुषार्थ को इसी क्रम से पुर्णतः साध ले तो कोई सक्षम गुरु उसके इन तीनों पुरुषार्थों को एकीकृत करके उसको चतुर्थ पुरुषार्थ “मोक्ष” की “वृद्धा” साधना के लिए अग्रसारित कर “महाविद्याओं की क्रमदीक्षा” को “श्रीविद्या दीक्षा” में परिवर्तित कर सकता है ! केवल इस परिस्थिति व शर्त पर ही “महाविद्या क्रमदीक्षा” को “श्रीविद्या दीक्षा” में परिवर्तित किया जा सकता है ! और महाविद्याओं व पुरुषार्थों के क्रम को पूर्ण हो जाने पर सक्षम गुरु द्वारा एकीकृत किये जाने के कारण ही इस पद्धति को “क्रमदीक्षा” कहा जाता है ! साथ ही इसमें सबसे महत्वपूर्ण विषय यह होता है कि तीन पुरुषार्थों को क्रम से पूर्ण किया हुआ “साधक” व इन पुरुषार्थों का विलय करके साधना को चतुर्थ क्रम में अग्रसारित करने में सक्षम “गुरु” का मिलन भी अत्यन्त दुर्लभ है !

उदहारणतः – यदि कोई साधक अहैतुक ही श्रीकुल की पृथक पृथक महाविद्याओं (बाल्या – षोडशी, तरुणा – त्रिपुरसुन्दरी व प्रौढ़ा – राजराजेश्वरी तक) की साधना सफलतापूर्वक सम्पन्न करते हुए क्रमशः धर्म, अर्थ व काम पुरुषार्थ को इसी क्रम से पुर्णतः साध ले तो कोई सक्षम गुरु उसके इन तीनों पुरुषार्थों को एकीकृत करके उसको चतुर्थ पुरुषार्थ “मोक्ष” की “वृद्धा – ललिताम्बा” साधना के लिए अग्रसारित कर “महाविद्याओं की क्रमदीक्षा” को “श्रीविद्या दीक्षा” में परिवर्तित कर सकता है !

इस विधि से श्रीविद्या में दीक्षित हुआ साधक श्रीविद्या क्रमदीक्षा लेकर संप्रदाय व कुल के अनुसार श्रीविद्या की प्रथम, द्वितीय, तृतीय व चतुर्थ क्रम की एक-एक शक्ति की क्रमशः दीक्षा लेकर साधना करता है, इसमें चतुर्थ क्रम की साधना तक पहुंचना अत्यंत कठिन होता है ! यह साधना क्रमशः चार चरणों में संपन्न होती है तथा प्रत्येक चरण की पृथक उपास्य शक्ति होती हैं, जिसके प्रत्येक चरण की साधना में साधक व गुरु की भूमिका ही प्रधान होती है ! श्रीविद्या की इस भेद से साधना के परिणाम स्वरूप साधक को क्रमशः धर्म, अर्थ व काम सम्बंधी समस्त भौतिक सुख ऐश्वर्यों की अतिशय प्राप्ति अवश्य हो जाती है किन्तु धर्म गौण रह जाने की प्रबल संभावनाओं के कारण मोक्ष तक का मार्ग सहज नहीं होता है !

“क्रमदीक्षा” प्राप्त साधक के पास साधना पूर्ण हो जाने पर अपने शिष्यों को केवल क्रमदीक्षा देने का ही विकल्प और अधिकार व शक्ति सीमित होते हैं, व “क्रमदीक्षा” प्राप्त साधक अपने शिष्यों को “पूर्णाभिषेक दीक्षा” कदापि नहीं दे सकता है ! श्रीविद्या उपासना हेतु “श्रीविद्या क्रमदीक्षा” लेना गौण होता है क्योंकि इसके साधक के पास अधिकार व शक्ति सीमित होते हैं ! परशुराम, दुर्वासा ऋषि, दत्तात्रेय, पुण्यानंद नाथ, अमृतानन्द नाथ, भास्करानन्द नाथ, उमानन्द नाथ जी आदि ने “श्रीविद्या क्रमदीक्षा” से युक्त होकर श्रीविद्या उपासना की है, व इनकी परम्परा में श्रीविद्या दीक्षा प्राप्त करने वाले साधक केवल “श्रीविद्या क्रमदीक्षा” प्राप्त करते हैं !

पिछले कुछ ही वर्षों में इस “श्रीविद्या क्रमदीक्षा” पद्धति के अन्तर्गत ही दुर्भाग्यवश एक ओर बड़ी विडम्बना फैली हुई है, वो यह कि बहुत से विद्वान “श्रीविद्या क्रमदीक्षा” के नाम से दीक्षा देते हैं और इसको भी श्रीविद्या की क्रमदीक्षा ही कहते हैं, जिसमें उनका अपना नया ही क्रम बनाया हुआ है जिसमें वो गुरु, गुरु चरण पादुका, गणपति, वाराही, महेश्वरी आदि मातृकाओं का क्रम बनाकर दीक्षा देते है, जबकि सत्य यह है कि यह विधि श्रीविद्या साधना की विधि है ही नहीं है, बल्कि यह विधि श्रीविद्या की शक्ति के चिन्ह “श्रीयन्त्र या श्रीचक्र” की उपासना विधि है न कि श्रीविद्या साधना विधि, और दुर्भाग्यवश कुछ विद्वानों द्वारा इस “श्री यन्त्र” की पूजा विधि द्वारा “श्रीविद्या की देवीयों की उपासना” पद्धति को भी श्रीविद्या साधना का नाम दे दिया गया है !

भ्रान्तिवश श्रीविद्या के अधीन “पूर्णाभिषेक दीक्षा”, “क्रमदीक्षा” व “महाविद्या दीक्षा” प्राप्त हुए तीनों प्रकार के उपासकों तथा पुस्तकों में सहज ही उपलब्ध “श्री यन्त्र” की पूजा विधि को सम्पन्न करने वाले “श्रीविद्या की देवीयों के उपासकों” को वर्तमान समाज के मध्य में श्रीविद्या साधक ही माना जा रहा है !

विवेकान्ध व तर्कशास्त्री गण ध्यान दें कि अर्थ के बिना काम कभी पूर्ण नहीं होता है, और धर्म के बिना मोक्ष काली कमली वाले के अन्नक्षेत्र के भण्डारे में नहीं बंटता है । इसीलिए मूल “श्रीविद्या साधना” ही सर्वोच्च है क्योंकि इसमें सबसे पहले धर्म पुरुषार्थ को ही साधना होता है, और धर्म युक्त अर्थ से काम के समस्त दैहिक, दैविक व भौतिक ऐश्वर्यों को भोगता हुआ निष्पाप प्राणी मोक्ष का अधिकारी तो स्वतः ही होता है ।

“श्रीविद्या पूर्णाभिषेक दीक्षा” के अतिरिक्त यदि इस संसार में श्रीविद्या साधना का कोई भी अन्य विधान पाया जाता है तो निश्चित ही वह इस मूल सर्वोपरि विद्या में अतिक्रमण है !

(यह लेख श्री नीलकंठ गिरी जी महाराज द्वारा अपने साधनात्मक शोधों पर लिखित पुस्तक का एक अंश है जिसका सर्वाधिकार व मूल प्रति हमारे पास सुरक्षित है, अतः कोई भी संस्था, संस्थान, प्रकाशक, लेखक या व्यक्ति इस लेख का कोई भी अंश अपने नाम से छापने या प्रचारित करने से पूर्व इस लेख में छुपा लिए गए अनेक तथ्यों के लिए शास्त्रार्थ व संवैधानिक कार्यवाही के लिए तैयार रहना सुनिश्चित करें !)