साधक की साधना में मन्त्र सिद्ध हो जाने के लक्षण !

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मंत्र सिद्धि होने से साधक में जो लक्षण प्रकट होते हैं उनके विषय में शास्त्रकारों ने कहा है-

“हृदये ग्रन्थि भेदश्च सर्व्वाय व वर्द्धनम्। आनन्दा श्रुणि पुलको देहावेशः कुलेश्वरी॥ गद्गदोक्तश्च सहसा जायते नात्र संशयः॥”

(तंत्र सार)

अर्थात्- “जप के समय हृदय ग्रन्थि भेद, समस्त अवयवों की वृद्धि, देहावेश और गदगद कण्ठ भाषण आदि भक्ति के चिन्ह प्रकट होते हैं, इसमें सन्देह नहीं। और भी अनेक प्रकार के चिन्ह प्रकट होते हैं।”

मंत्र के सिद्ध होने का सबसे मुख्य लक्षण तो यही है कि साधक के मनोरथ की पूर्ति हो जाय। साधक की जिस समय जो अभिलाषा हो वह तुरंत पूर्ण होती दिखलाई दे तो समझ लेना चाहिये कि मंत्र सिद्धि हुई है। मंत्र के सिद्ध होने से मृत्यु भय का निराकरण, देवता दर्शन, देवता के साथ वार्तालाप, मंत्र की भयंकर शब्द सुनाई पड़ना आदि लक्षण भी दिखलाई पड़ते हैं।

“सकृदुच्चरितेऽप्येवं मंत्रे चैतन्य संयुते। दृष्यन्ते प्रत्यया यत्र पारपर्य्य तदुच्यते॥

(तंत्रसार)

“अर्थात्- “चैतन्य को संयुक्त करके मंत्र का एक बार उच्चारण करने से ही ऊपर बतलाये भावों का विकास हो जाता है।”

जिस साधक को मंत्र की सम्पूर्ण सिद्धि प्राप्त हो जाती है वह देवता का दर्शन कर सकता है, मृत्यु का निवारण कर सकता है, परकाया प्रवेश कर सकता है, चाहे जिस स्थान में प्रवेश कर सकता है, आकाश मार्ग में उड़ सकता है, खेचरी देवियों के साथ मिलकर उनकी बातचीत सुन सकता है। ऐसा साधक पृथ्वी के अनेक स्तरों को भेद कर भूमि के नीचे के पदार्थों को देख सकता है। ऐसे महापुरुष की कीर्ति चारों दिशाओं में व्याप्त हो जाती है, उसे वाहन, भूषण आदि समस्त सामग्री प्राप्त होने लगती हैं और वह बहुत समय तक जीवित रह सकता है। वह राजा और अधिकारी वर्ग को प्रभावित कर सकता है और सब तरह के चमत्कारी कार्य करके सुखपूर्वक जीवन व्यतीत कर सकता है। ऐसे सत्पुरुष की दृष्टि पड़ते ही अनेक प्रकार की व्याधियाँ और विषों का निवारण हो जाता है। वह सर्व शास्त्रों में पारंगत होकर चार प्रकार का पाण्डित्य प्राप्त करता है। वह विषय भोग के प्रति वैराग्य धारण करके केवल मुक्ति की ही कामना करता है। उसमें सर्व प्रकार की परित्याग की भावना और सबको वश में करने की शक्ति उत्पन्न हो जाती है। वह अष्टाँग योग का अभ्यास कर सकता है, विषय भोग की इच्छा से दूर रहता है, सर्व प्राणियों के प्रति दया रखता है और सर्वज्ञता की शक्ति को प्राप्त करता है। सब प्रकार का साँसारिक वैभव, पारिवारिक सुख और लोक में यश उसे मंत्र-सिद्धि की प्रथम अवस्था में ही प्राप्त हो जाते हैं।

तात्पर्य यह है कि योग सिद्धि और मंत्र सिद्धि में कोई भेद नहीं हैं, दोनों प्रकार के साधनों का उद्देश्य एक ही है, केवल साधन मार्ग में अन्तर रहता है। वास्तव में जो साधक जिस किसी विधि से मंत्र की पूर्ण सिद्धि प्राप्त कर लेता है तो उसके प्रभाव से वह स्वयं शिव तुल्य हो जाता है। कहा हैं- “सिद्ध मन्त्रस्तु यः साक्षात् स शिवो नात्र संशय।”

मंत्र साधक को शास्त्र में बतलाई किसी भी पद्धति का अवलम्बन करके मंत्र सिद्धि प्राप्त करनी चाहिये और जीवन्मुक्त होकर शिव सायुज्य अथवा निर्माण मुक्ति प्राप्त करना अपना लक्ष्य रखना चाहिये। युगावतार भगवान रामकृष्ण परमहंस ने ऐसी स्थिति प्राप्त कर ली थी, उन्होंने अपने अनुभव या अन्य साधकों को बतलाया था-

दीक्षा में प्राप्त हुए मन्त्र का मंत्र जप अथवा अपने किसी इष्ट देव का जप करने से सब प्रकार की इच्छायें पूर्ण होती हैं। एकाग्र चित्त, मन और प्राण को एक करके जप करना चाहिये, इष्ट देव के नाम रूपी मंत्र का जप करते-करते समुद्र में डूब जाओ, बस तुम भव सागर से पार हो जाओगे ।